मैं 'शाद' तन्हा इक तरफ़ और दुनिया की दुनिया इक तरफ़

शाद अज़ीमाबादी

मैं 'शाद' तन्हा इक तरफ़ और दुनिया की दुनिया इक तरफ़

शाद अज़ीमाबादी

MORE BY शाद अज़ीमाबादी

    मैं 'शाद' तन्हा इक तरफ़ और दुनिया की दुनिया इक तरफ़

    सारा समुंदर इक तरफ़ आँसू का क़तरा इक तरफ़

    उस आफ़त-ए-जाँ को भी चेहरा तो दिखाना ही था

    इक सम्त ईसा दम-ब-ख़ुद ग़श में है मूसा इक तरफ़

    अपने समंद-ए-नाज़ को शहसवार छेड़ कर

    सफ़-बस्ता हाज़िर कब से हैं महव-ए-तमाशा इक तरफ़

    साक़ी बग़ैर अहवाल ये पहुँचा है मय-ख़ाने का अब

    जाम इक तरफ़ है सर-निगूँ ख़ाली है मीना इक तरफ़

    फ़ुर्क़त में सब अच्छे रहे दिल का मगर ये हाल है

    ज़ख़्म इक तरफ़ बढ़ता गया दाग़-ए-सुवैदा इक तरफ़

    दीदार-ए-जानाँ का भला क्यूँ कर तहम्मुल हो सके

    तिरछी निगाहें एक सू ज़ुल्फ़-ए-चलीपा इक तरफ़

    वो तेग़ ले के कहते हैं देखूँ तो हक़ पर कौन है

    मैं इक तरफ़ 'शाद' इक तरफ़ सारा ज़माना इक तरफ़

    स्रोत:

    • Book: Dewan-e-shad Azimabadi (Pg. 203)
    • Author: Shad Azimabadi
    • प्रकाशन: Educational Publishing House (2005)
    • संस्करण: 2005

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Lorem ipsum dolor sit amet, consectetur adipiscing elit. Morbi volutpat porttitor tortor, varius dignissim.

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY

    Added to your favorites

    Removed from your favorites