तेरी ज़ुल्फ़ों का तलब-गार नहीं हो सकता
तेरी ज़ुल्फ़ों का तलब-गार नहीं हो सकता
दिल मोहब्बत में गिरफ़्तार नहीं हो सकता
अहल-ए-बातिल से मरासिम नहीं रखते हैं हम
अहल-ए-हक़ का तो ये किरदार नहीं हो सकता
खिड़कियाँ खोल दो कमरे की घुटन कम होगी
हाँ मगर दिल तो हवा-दार नहीं हो सकता
फ़न का मे'यार बुलंदी की तरफ़ माएल कर
यूँही ग़ालिब का तरफ़-दार नहीं हो सकता
फिर भी मैं यार को पलकों पे बिठा लेता हूँ
है ये मा'लूम वफ़ा-दार नहीं हो सकता
अपने रब से तिरी बख़्शिश की दु'आ माँगूँगा
तू कभी 'इश्क़ में ग़द्दार नहीं हो सकता
ये यक़ीं है कि उसे दुख है कई सदियों का
मर्द रोए तो अदाकार नहीं हो सकता
ये तिरा शहर तो काँटों का कोई मस्कन है
ये मिरा गाँव यहाँ ख़ार नहीं हो सकता
इतनी पस्ती पे नज़र आते हो 'मुश्ताक़' कि तुम
अहल-ए-फ़न का तो ये मे'यार नहीं हो सकता
Additional information available
Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.
About this sher
rare Unpublished content
This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.