अब्दुल हमीद अदम

  • 1909-1981

लोकप्रिय शायर, ज़िंदगी और मोहब्बत से संबंधित रुमानी शायरी के लिए विख्यात।

लोकप्रिय शायर, ज़िंदगी और मोहब्बत से संबंधित रुमानी शायरी के लिए विख्यात।

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ग़ज़लश्रेणी
अगरचे रोज़-ए-अज़ल भी यही अँधेरा था0
अब दो-आलम से सदा-ए-साज़ आती है मुझे0
अरे मय-गुसारो सवेरे सवेरे0
आँखों से तिरी ज़ुल्फ़ का साया नहीं जाता0
आगही में इक ख़ला मौजूद है2
आज फिर रूह में एक बर्क़ सी लहराती है0
आता है कौन दर्द के मारों के शहर में0
उन को अहद-ए-शबाब में देखा0
एक ना-मक़बूल क़ुर्बानी हूँ मैं2
ऐ साक़ी-ए-मह-वश ग़म-ए-दौराँ नहीं उठता0
कश्ती चला रहा है मगर किस अदा के साथ1
कितनी बे-साख़्ता ख़ता हूँ मैं0
क्या बात है ऐ जान-ए-सुख़न बात किए जा0
ख़ाली है अभी जाम मैं कुछ सोच रहा हूँ1
खुली वो ज़ुल्फ़ तो पहली हसीन रात हुई0
ख़ुश हूँ कि ज़िंदगी ने कोई काम कर दिया0
ख़ैरात सिर्फ़ इतनी मिली है हयात से0
ग़म-ए-मोहब्बत सता रहा है ग़म-ए-ज़माना मसल रहा है0
गिरते हैं लोग गर्मी-ए-बाज़ार देख कर1
गुनाह-ए-जुरअत-ए-तदबीर कर रहा हूँ मैं0
गो तिरी ज़ुल्फ़ों का ज़िंदानी हूँ मैं0
गोरियों कालियों ने मार दिया0
छेड़ो तो उस हसीन को छेड़ो जो यार हो0
ज़ख़्म दिल के अगर सिए होते1
जब तिरे नैन मुस्कुराते हैं0
ज़बाँ पर आप का नाम आ रहा था0
जहाँ वो ज़ुल्फ़-ए-बरहम कारगर महसूस होती है0
जिस वक़्त भी मौज़ूँ सी कोई बात हुई है0
जुम्बिश-ए-काकुल-ए-महबूब से दिन ढलता है0
ज़ुल्फ़-ए-बरहम सँभाल कर चलिए1
जो भी तेरे फ़क़ीर होते हैं0
तकलीफ़ मिट गई मगर एहसास रह गया1
तही सा जाम तो था गिर के बह गया होगा0
तौबा का तकल्लुफ़ कौन करे हालात की निय्यत ठीक नहीं0
दरोग़ के इम्तिहाँ-कदे में सदा यही कारोबार होगा0
दिल को दिल से काम रहेगा0
दिल डूब न जाएँ प्यासों के तकलीफ़ ज़रा फ़रमा देना0
दिल है बड़ी ख़ुशी से इसे पाएमाल कर0
दुआएँ दे के जो दुश्नाम लेते रहते हैं0
देख कर दिल-कशी ज़माने की1
फ़क़ीर किस दर्जा शादमाँ थे हुज़ूर को कुछ तो याद होगा0
बस इस क़दर है ख़ुलासा मिरी कहानी का2
बहुत से लोगों को ग़म ने जिला के मार दिया0
बे-जुम्बिश-ए-अब्रू तो नहीं काम चलेगा0
बे-सबब क्यूँ तबाह होता है0
भूली-बिसरी बातों से क्या तश्कील-ए-रूदाद करें0
भूले से कभी ले जो कोई नाम हमारा0
मतलब मुआ'मलात का कुछ पा गया हूँ मैं3
मय-कदा था चाँदनी थी मैं न था3
मय-ख़ाना-ए-हस्ती में अक्सर हम अपना ठिकाना भूल गए0
मिरा इख़्लास भी इक वज्ह-ए-दिल-आज़ारी है0
मुंक़लिब सूरत-ए-हालात भी हो जाती है1
मुझ से चुनाँ-चुनीं न करो मैं नशे मैं हूँ0
मुश्किल ये आ पड़ी है कि गर्दिश में जाम है1
मुस्कुरा कर ख़िताब करते हो0
मोहतात ओ होशियार तो बे-इंतिहा हूँ मैं0
ये कैसी सरगोशी-ए-अज़ल साज़-ए-दिल के पर्दे हिला रही है0
रक़्स करता हूँ जाम पीता हूँ0
लहरा के झूम झूम के ला मुस्कुरा के ला1
वो अबरू याद आते हैं वो मिज़्गाँ याद आते हैं0
वो अहद-ए-जवानी वो ख़राबात का आलम0
वो जो तेरे फ़क़ीर होते हैं0
वो बातें तिरी वो फ़साने तिरे0
वो सूरज इतना नज़दीक आ रहा है0
शब की बेदारियाँ नहीं अच्छी0
साक़ी शराब ला कि तबीअ'त उदास है1
सितारों के आगे जो आबादियाँ हैं0
सो के जब वो निगार उठता है0
हँस के बोला करो बुलाया करो0
हँस हँस के जाम जाम को छलका के पी गया0
हम ने हसरतों के दाग़ आँसुओं से धो लिए0
हम से चुनाँ-चुनीं न करो हम नशे में हैं0
हर दुश्मन-ए-वफ़ा मुझे महबूब हो गया0
हल्का हल्का सुरूर है साक़ी1
हवा सनके ख़ारों की बड़ी तकलीफ़ होती है0
हसीन नग़्मा-सराओ! बहार के दिन हैं0
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