Asrar-ul-Haq Majaz's Photo'

असरार-उल-हक़ मजाज़

1911 - 1955 | लखनऊ, भारत

अग्रणी एवं प्रख्यात प्रगतिशील शायर, रोमांटिक और क्रांतिकारी नज़्मों के लिए प्रसिद्ध, ऑल इंडिया रेडियो की पत्रिका “आवाज” के पहले संपादक, मशहूर शायर और गीतकार जावेद अख़्तर के मामा

आँख से आँख जब नहीं मिलती

दिल से दिल हम-कलाम होता है

बहुत मुश्किल है दुनिया का सँवरना

तिरी ज़ुल्फ़ों का पेच-ओ-ख़म नहीं है

बताऊँ क्या तुझे हम-नशीं किस से मोहब्बत है

मैं जिस दुनिया में रहता हूँ वो इस दुनिया की औरत है

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दफ़्न कर सकता हूँ सीने में तुम्हारे राज़ को

और तुम चाहो तो अफ़्साना बना सकता हूँ मैं

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हाए वो वक़्त कि जब बे-पिए मद-होशी थी

हाए ये वक़्त कि अब पी के भी मख़्मूर नहीं

इस महफ़िल-ए-कैफ़-ओ-मस्ती में इस अंजुमन-ए-इरफ़ानी में

सब जाम-ब-कफ़ बैठे ही रहे हम पी भी गए छलका भी गए

इश्क़ का ज़ौक़-ए-नज़ारा मुफ़्त में बदनाम है

हुस्न ख़ुद बे-ताब है जल्वा दिखाने के लिए

love is needlessly defamed that for vision it is keen

beauty is impatient too for its splendour to be seen

love is needlessly defamed that for vision it is keen

beauty is impatient too for its splendour to be seen

कुछ तुम्हारी निगाह काफ़िर थी

कुछ मुझे भी ख़राब होना था

क्या क्या हुआ है हम से जुनूँ में पूछिए

उलझे कभी ज़मीं से कभी आसमाँ से हम

क्यूँ जवानी की मुझे याद आई

मैं ने इक ख़्वाब सा देखा क्या था

मुझ को ये आरज़ू वो उठाएँ नक़ाब ख़ुद

उन को ये इंतिज़ार तक़ाज़ा करे कोई

I had hoped she would unveil at her own behest

and she waits for someone to make a request

I had hoped she would unveil at her own behest

and she waits for someone to make a request

फिर किसी के सामने चश्म-ए-तमन्ना झुक गई

शौक़ की शोख़ी में रंग-ए-एहतराम ही गया

रोएँ अभी अहल-ए-नज़र हाल पे मेरे

होना है अभी मुझ को ख़राब और ज़ियादा

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रूदाद-ए-ग़म-ए-उल्फ़त उन से हम क्या कहते क्यूँकर कहते

इक हर्फ़ निकला होंटों से और आँख में आँसू भी गए

सब का तो मुदावा कर डाला अपना ही मुदावा कर सके

सब के तो गरेबाँ सी डाले अपना ही गरेबाँ भूल गए

तिरे माथे पे ये आँचल तो बहुत ही ख़ूब है लेकिन

तू इस आँचल से इक परचम बना लेती तो अच्छा था

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तुम ने तो हुक्म-ए-तर्क-ए-तमन्ना सुना दिया

किस दिल से आह तर्क-ए-तमन्ना करे कोई

तुम्हीं तो हो जिसे कहती है नाख़ुदा दुनिया

बचा सको तो बचा लो कि डूबता हूँ मैं

ये आना कोई आना है कि बस रस्मन चले आए

ये मिलना ख़ाक मिलना है कि दिल से दिल नहीं मिलता

ये मेरे इश्क़ की मजबूरियाँ मआज़-अल्लाह

तुम्हारा राज़ तुम्हीं से छुपा रहा हूँ मैं

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