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इफ़्तिख़ार आरिफ़

1940 | इस्लामाबाद, पाकिस्तान

पाकिस्तान में अग्रणी शायरों में शामिल, अपनी सांस्कृतिक रूमानियत के लिए मशहूर।

पाकिस्तान में अग्रणी शायरों में शामिल, अपनी सांस्कृतिक रूमानियत के लिए मशहूर।

ख़्वाब की तरह बिखर जाने को जी चाहता है

ऐसी तन्हाई कि मर जाने को जी चाहता है

दिल पागल है रोज़ नई नादानी करता है

आग में आग मिलाता है फिर पानी करता है

ख़ुद को बिखरते देखते हैं कुछ कर नहीं पाते हैं

फिर भी लोग ख़ुदाओं जैसी बातें करते हैं

तुम से बिछड़ कर ज़िंदा हैं

जान बहुत शर्मिंदा हैं

मिरे ख़ुदा मुझे इतना तो मो'तबर कर दे

मैं जिस मकान में रहता हूँ उस को घर कर दे

दुआएँ याद करा दी गई थीं बचपन में

सो ज़ख़्म खाते रहे और दुआ दिए गए हम

वफ़ा की ख़ैर मनाता हूँ बेवफ़ाई में भी

मैं उस की क़ैद में हूँ क़ैद से रिहाई में भी

रास आने लगी दुनिया तो कहा दिल ने कि जा

अब तुझे दर्द की दौलत नहीं मिलने वाली

मिट्टी की मोहब्बत में हम आशुफ़्ता-सरों ने

वो क़र्ज़ उतारे हैं कि वाजिब भी नहीं थे

अज़ाब ये भी किसी और पर नहीं आया

कि एक उम्र चले और घर नहीं आया

कोई तो फूल खिलाए दुआ के लहजे में

अजब तरह की घुटन है हवा के लहजे में

वही चराग़ बुझा जिस की लौ क़यामत थी

उसी पे ज़र्ब पड़ी जो शजर पुराना था

बुलंद हाथों में ज़ंजीर डाल देते हैं

अजीब रस्म चली है दुआ माँगे कोई

वही फ़िराक़ की बातें वही हिकायत-ए-वस्ल

नई किताब का एक इक वरक़ पुराना था

पयम्बरों से ज़मीनें वफ़ा नहीं करतीं

हम ऐसे कौन ख़ुदा थे कि अपने घर रहते

तमाम ख़ाना-ब-दोशों में मुश्तरक है ये बात

सब अपने अपने घरों को पलट के देखते हैं

ख़ाक में दौलत-ए-पिंदार-ओ-अना मिलती है

अपनी मिट्टी से बिछड़ने की सज़ा मिलती है

हमीं में रहते हैं वो लोग भी कि जिन के सबब

ज़मीं बुलंद हुई आसमाँ के होते हुए

मिरा ख़ुश-ख़िराम बला का तेज़-ख़िराम था

मिरी ज़िंदगी से चला गया तो ख़बर हुई

रोज़ इक ताज़ा क़सीदा नई तश्बीब के साथ

रिज़्क़ बर-हक़ है ये ख़िदमत नहीं होगी हम से