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शेर
किस तरह छोड़ूँ यकायक तेरी ज़ुल्फ़ों का ख़याल
एक मुद्दत के ये काले नाग हैं पाले हुए
इमाम बख़्श नासिख़
शेर
हर शाख़ ज़र्द ओ सुर्ख़ ओ सियह हिज्र-ए-यार में
डसते हैं दिल को आन के जूँ नाग ऐ बसंत
इंशा अल्लाह ख़ान इंशा
शेर
गहरे सुर्ख़ गुलाब का अंधा बुलबुल साँप को क्या देखेगा
पास ही उगती नाग-फनी थी सारे फूल वहीं मिलते हैं