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शेर
शायद उसी का ज़िक्र हो यारो मैं इस लिए
सुनता हूँ गोश-ए-दिल से हर इक मर्द-ओ-ज़न की बात
जुरअत क़लंदर बख़्श
शेर
तेरी इस्मत में हमें शक नहीं ऐ माया-ए-नाज़
पर करें क्या जो न समझे दिल-ए-बद-ज़न अपना
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
शेर
ज़ीं-साज़ी अगर आती मुझे मैं तो मिरी जाँ
पलकों से बनाता तिरे फ़ितराक के डोरे