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ग़ज़ल
परस्तिश कर रहा है हर जवान-ओ-पीर पत्थर की
सनम-ख़ाने में आ कर जाग उठी तक़दीर पत्थर की
जौहर बदायूनी
ग़ज़ल
बना है शीशा-ए-मय सर-ब-सर आईना-ए-महशर
बरी ज़ोहद-ओ-रिया से है जवान-ए-पीर-ए-मय-ख़ाना
दत्तात्रिया कैफ़ी
ग़ज़ल
बाज़ मक़्तूल हुए बाज़ों ने फाँसी पाई
नाम को भी न रहे पीर-ओ-जवान-ए-देहली
सय्यद मेहदी हुसैन मेहदी
ग़ज़ल
ख़ुश्क ओ तर फूँकती फिरती है सदा आतिश-ए-इश्क़
बचियो इस आँच से ऐ पीर ओ जवाँ सुनते हो
क़ाएम चाँदपुरी
ग़ज़ल
सब एक रंग में हैं मय-कदे के ख़ुर्द ओ कलाँ
यहाँ तफ़ावुत-ए-पीर-ओ-जवाँ नहीं होता
ख़्वाजा अज़ीज़ुल हसन मज्ज़ूब
ग़ज़ल
क्यूँ 'वक़ार' अपना गला पीर-ओ-जवाँ फाड़ते हैं
पीर-ए-कोहना है फ़लक हद से है सुनता ऊँचा
किशन कुमार वक़ार
ग़ज़ल
सीखी है उस जवान ने पीर-ए-फ़लक की चाल
हिर-फिर के मुझ को ख़ाक में आख़िर मिला दिया
मिर्ज़ा रज़ा बर्क़
ग़ज़ल
रहा करते हैं मय-ख़ानों में हम पीर-ए-मुग़ाँ हो कर
तबीअत ज़िंदा-दिल रखती है पीरी में जवाँ हो कर