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ग़ज़ल
मिरे जीव आरसी में ख़याल तुज मुख का सो दिस्ता है
करे ऊ ख़याल मुंज दिल में निशानी ज़र-फ़िशानी का
क़ुली क़ुतुब शाह
ग़ज़ल
बलायाँ जीव का ले मैं पड़ूँगी पाँव में दिल सूँ
वले ज़ाहिर में दिखलाने कूँ हो अग़्यार बैठूँगी
हाश्मी बीजापुरी
ग़ज़ल
जीव ने मरने में हक़ ऊपर तवक्कुल है उसे
'आबरू' नीं ज़ख़्म के खाने में हाथ ओड़ा नहीं
आबरू शाह मुबारक
ग़ज़ल
मुझ से रक़ीब-ओ-लईं जीव में रखता है कीं
उस सग-ए-नापाक सूँ ख़ूब नहीं बोलना