aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम ",naG"
ओ देस से आने वाले बताक्या अब भी रुख़-ए-गुलरंग पे वोजन्नत के नज़ारे रौशन हैंक्या अब भी रसीली आँखों मेंसावन के सितारे रौशन हैंओ देस से आने वाले बताओ देस से आने वाले बताक्या अब भी शहाबी आरिज़ परगेसू-ए-सियह बिल खाते हैंया बहर-ए-शफ़क़ की मौजों परदो नाग पड़े लहराते हैंऔर जिन की झलक से सावन कीरातों के सपने आते हैंओ देस से आने वाले बता
दयार-ए-हिन्द था गहवारा याद है हमदमबहुत ज़माना हुआ किस के किस के बचपन काइसी ज़मीन पे खेला है 'राम' का बचपनइसी ज़मीन पे उन नन्हे नन्हे हाथों नेकिसी समय में धनुष-बान को सँभाला थाइसी दयार ने देखी है 'कृष्ण' की लीलायहीं घरोंदों में सीता सुलोचना राधाकिसी ज़माने में गुड़ियों से खेलती होंगीयही ज़मीं यही दरिया पहाड़ जंगल बाग़यही हवाएँ यही सुब्ह-ओ-शाम सूरज चाँदयही घटाएँ यही बर्क़-ओ-र'अद ओ क़ौस-ए-क़ुज़हयहीं के गीत रिवायात मौसमों के जुलूसहुआ ज़माना कि 'सिद्धार्थ' के थे गहवारेइन्ही नज़ारों में बचपन कटा था 'विक्रम' कासुना है 'भर्तृहरि' भी इन्हीं से खेला था'भरत' 'अगस्त्य' 'कपिल' 'व्यास' 'पाशी' 'कौटिल्य''जनक' 'वशिष्ठ' 'मनु' 'वाल्मीकि' 'विश्वामित्र''कणाद' 'गौतम' ओ 'रामानुज' 'कुमारिल-भट्ट'मोहनजोडारो हड़प्पा के और अजंता केबनाने वाले यहीं बल्लमों से खेले थेइसी हिंडोले में 'भवभूति' ओ 'कालीदास' कभीहुमक हुमक के जो तुतला के गुनगुनाए थेसरस्वती ने ज़बानों को उन की चूमा थायहीं के चाँद व सूरज खिलौने थे उन केइन्हीं फ़ज़ाओं में बचपन पला था 'ख़ुसरव' काइसी ज़मीं से उठे 'तानसेन' और 'अकबर''रहीम' 'नानक' ओ 'चैतन्य' और 'चिश्ती' नेइन्हीं फ़ज़ाओं में बचपन के दिन गुज़ारे थेइसी ज़मीं पे कभी शाहज़ादा-ए-'ख़ुर्रम'ज़रा सी दिल-शिकनी पर जो रो दिया होगाभर आया था दिल-ए-नाज़ुक तो क्या अजब इस मेंइन आँसुओं में झलक ताज की भी देखी हो'अहिल्याबाई' 'दमन' 'पदमिनी' ओ 'रज़िया' नेयहीं के पेड़ों की शाख़ों में डाले थे झूलेइसी फ़ज़ा में बढ़ाई थी पेंग बचपन कीइन्ही नज़ारों में सावन के गीत गाए थेइसी ज़मीन पे घुटनों के बल चले होंगे'मलिक-मोहम्मद' ओ 'रसखान' और 'तुलसी-दास'इन्हीं फ़ज़ाओं में गूँजी थी तोतली बोली'कबीर-दास' 'टुकाराम' 'सूर' ओ 'मीरा' कीइसी हिंडोले में 'विद्यापति' का कंठ खुलाइसी ज़मीन के थे लाल 'मीर' ओ 'ग़ालिब' भीठुमक ठुमक के चले थे घरों के आँगन में'अनीस' ओ 'हाली' ओ 'इक़बाल' और 'वारिस-शाह'यहीं की ख़ाक से उभरे थे 'प्रेमचंद' ओ 'टैगोर'यहीं से उठ्ठे थे तहज़ीब-ए-हिन्द के मेमारइसी ज़मीन ने देखा था बाल-पन इन कायहीं दिखाई थीं इन सब ने बाल-लीलाएँयहीं हर एक के बचपन ने तर्बियत पाईयहीं हर एक के जीवन का बालकांड खुलायहीं से उठते बगूलों के साथ दौड़े हैंयहीं की मस्त घटाओं के साथ झूमे हैंयहीं की मध-भरी बरसात में नहाए हैंलिपट के कीचड़ ओ पानी से बचपने उन केइसी ज़मीन से उठ्ठे वो देश के सावंतउड़ा दिया था जिन्हें कंपनी ने तोपों सेइसी ज़मीन से उठी हैं अन-गिनत नस्लेंपले हैं हिन्द हिंडोले में अन-गिनत बच्चेमुझ ऐसे कितने ही गुमनाम बच्चे खेले हैंइसी ज़मीं से इसी में सुपुर्द-ए-ख़ाक हुएज़मीन-ए-हिन्द अब आराम-गाह है उन कीइस अर्ज़-ए-पाक से उट्ठीं बहुत सी तहज़ीबेंयहीं तुलू हुईं और यहीं ग़ुरूब हुईंइसी ज़मीन से उभरे कई उलूम-ओ-फ़ुनूनफ़राज़-ए-कोह-ए-हिमाला ये दौर-ए-गंग-ओ-जमनऔर इन की गोद में पर्वर्दा कारवानों नेयहीं रुमूज़-ए-ख़िराम-ए-सुकूँ-नुमा सीखेनसीम-ए-सुब्ह-ए-तमद्दुन ने भैरवीं छेड़ीयहीं वतन के तरानों की वो पवें फूटेंवो बे-क़रार सुकूँ-ज़ा तरन्नुम-ए-सहरीवो कपकपाते हुए सोज़-ओ-साज़ के शोलेइन्ही फ़ज़ाओं में अंगड़ाइयाँ जो ले के उठेलवों से जिन के चराग़ाँ हुई थी बज़्म-ए-हयातजिन्हों ने हिन्द की तहज़ीब को ज़माना हुआबहुत से ज़ावियों से आईना दिखाया थाइसी ज़मीं पे ढली है मिरी हयात की शामइसी ज़मीन पे वो सुब्ह मुस्कुराई हैतमाम शोला ओ शबनम मिरी हयात की सुब्हसुनाऊँ आज कहानी मैं अपने बचपन कीदिल-ओ-दिमाग़ की कलियाँ अभी न चटकी थींहमेशा खेलता रहता था भाई बहनों मेंहमारे साथ मोहल्ले की लड़कियाँ लड़केमचाए रखते थे बालक उधम हर एक घड़ीलहू तरंग उछल-फाँद का ये आलम थामोहल्ला सर पे उठाए फिरे जिधर गुज़रेहमारे चहचहे और शोर गूँजते रहतेचहार-सम्त मोहल्ले के गोशे गोशे मेंफ़ज़ा में आज भी ला-रैब गूँजते होंगेअगरचे दूसरे बच्चों की तरह था मैं भीब-ज़ाहिर औरों के बचपन सा था मिरा बचपनये सब सही मिरे बचपन की शख़्सियत भी थी एकवो शख़्सियत कि बहुत शोख़ जिस के थे ख़द-ओ-ख़ालअदा अदा में कोई शान-ए-इन्फ़िरादी थीग़रज़ कुछ और ही लक्षण थे मेरे बचपन केमुझे था छोटे बड़ों से बहुत शदीद लगावहर एक पर मैं छिड़कता था अपनी नन्ही सी जाँदिल उमडा आता था ऐसा कि जी ये चाहता थाउठा के रख लूँ कलेजे में अपनी दुनिया कोमुझे है याद अभी तक कि खेल-कूद में भीकुछ ऐसे वक़्फ़े पुर-असरार आ ही जाते थेकि जिन में सोचने लगता था कुछ मिरा बचपनकई मआनी-ए-बे-लफ़्ज़ छूने लगते थेबुतून-ए-ग़ैब से मेरे शुऊर-ए-असग़र कोहर एक मंज़र-ए-मानूस घर का हर गोशाकिसी तरह की हो घर में सजी हुई हर चीज़मिरे मोहल्ले की गलियाँ मकाँ दर-ओ-दीवारचबूतरे कुएँ कुछ पेड़ झाड़ियाँ बेलेंवो फेरी वाले कई उन के भाँत भाँत के बोलवो जाने बूझे मनाज़िर वो आसमाँ ओ ज़मींबदलते वक़्त का आईना गर्मी-ओ-ख़ुनकीग़ुरूब-ए-महर में रंगों का जागता जादूशफ़क़ के शीश-महल में गुदाज़-ए-पिन्हाँ सेजवाहरों की चटानें सी कुछ पिघलती हुईंशजर हजर की वो कुछ सोचती हुई दुनियासुहानी रात की मानूस रमज़ियत का फ़ुसूँअलस्सबाह उफ़ुक़ की वो थरथराती भवेंकिसी का झाँकना आहिस्ता फूटती पौ सेवो दोपहर का समय दर्जा-ए-तपिश का चढ़ावथकी थकी सी फ़ज़ा में वो ज़िंदगी का उतारहुआ की बंसियाँ बंसवाड़ियों में बजती हुईंवो दिन के बढ़ते हुए साए सह-पहर का सुकूँसुकूत शाम का जब दोनों वक़्त मिलते हैंग़रज़ झलकते हुए सरसरी मनाज़िर परमुझे गुमान परिस्तानियत का होता थाहर एक चीज़ की वो ख़्वाब-नाक अस्लिय्यतमिरे शुऊर की चिलमन से झाँकता था कोईलिए रुबूबियत-ए-काएनात का एहसासहर एक जल्वे में ग़ैब ओ शुहूद का वो मिलापहर इक नज़ारा इक आईना-ख़ाना-ए-हैरतहर एक मंज़र-ए-मानूस एक हैरत-ज़ारकहीं रहूँ कहीं खेलों कहीं पढ़ूँ लिखूँमिरे शुऊर पे मंडलाते थे मनाज़िर-ए-दहरमैं अक्सर उन के तसव्वुर में डूब जाता थावफ़ूर-ए-जज़्बा से हो जाती थी मिज़ा पुर-नममुझे यक़ीन है इन उन्सुरी मनाज़िर सेकि आम बच्चों से लेता था मैं ज़ियादा असरकिसी समय मिरी तिफ़्ली रही न बे-परवान छू सकी मिरी तिफ़्ली को ग़फ़लत-ए-तिफ़्लीये खेल-कूद के लम्हों में होता था एहसासदुआएँ देता हो जैसे मुझे सुकूत-ए-दवामकि जैसे हाथ अबद रख दे दोश-ए-तिफ़्ली परहर एक लम्हा के रख़नों से झाँकती सदियाँकहानियाँ जो सुनूँ उन में डूब जाता थाकि आदमी के लिए आदमी की जग-बीतीसे बढ़ के कौन सी शय और हो ही सकती हैइन्ही फ़सानों में पिन्हाँ थे ज़िंदगी के रुमूज़इन्ही फ़सानों में खुलते थे राज़-हा-ए-हयातउन्हें फ़सानों में मिलती थीं ज़ीस्त की क़द्रेंरुमूज़-ए-बेश-बहा ठेठ आदमियत केकहानियाँ थीं कि सद-दर्स-गाह-ए-रिक़्क़त-ए-क़ल्बहर इक कहानी में शाइस्तगी-ए-ग़म का सबक़वो उंसुर आँसुओं का दास्तान-ए-इंसाँ मेंवो नल-दमन की कथा सरगुज़श्त-ए-सावित्री'शकुन्तला' की कहानी 'भरत' की क़ुर्बानीवो मर्ग-ए-भीष्म-पितामह वो सेज तीरों कीवो पांचों पांडव की स्वर्ग-यात्रा की कथावतन से रुख़्सत-ए-'सिद्धार्थ' 'राम' का बन-बासवफ़ा के ब'अद भी 'सीता' की वो जिला-वतनीवो रातों-रात 'सिरी-कृष्ण' को उठाए हुएबला की क़ैद से 'बसदेव' का निकल जानावो अंधकार वो बारिश, बढ़ी हुई जमुनाग़म-ए-आफ़रीन कहानी वो 'हीर' 'राँझा' कीशुऊर-ए-हिन्द के बचपन की यादगार-ए-अज़ीमकि ऐसे वैसे तख़य्युल की साँस उखड़ जाएकई मुहय्युर-ए-इदराक देव-मालाएँहितोपदेश के क़िस्से कथा सरत-सागरकरोड़ों सीनों में वो गूँजता हुआ आल्हामैं पूछता हूँ किसी और मलक वालों सेकहानियों की ये दौलत ये बे-बहा दौलतफ़साने देख लो इन के नज़र भी आती हैमैं पूछता हूँ कि गहवारे और क़ौमों केबसे हुए हैं कहीं ऐसी दास्तानों सेकहानियाँ जो मैं सुनता था अपने बचपन मेंमिरे लिए वो न थीं महज़ बाइस-ए-तफ़रीहफ़सानों से मिरे बचपन ने सोचना सीखाफ़सानों से मुझे संजीदगी के दर्स मिलेफ़सानों में नज़र आती थी मुझ को ये दुनियाग़म ओ ख़ुशी में रची प्यार में बसाई हुईफ़सानों से मिरे दिल ने घुलावटें पाईंयही नहीं कि मशाहीर ही के अफ़्सानेज़रा सी उम्र में करते हों मुझ को मुतअस्सिरमोहल्ले टोले के गुमनाम आदमिय्यों केकुछ ऐसे सुनने में आते थे वाक़िआत-ए-हयातजों यूँ तो होते थे फ़र्सूदा और मामूलीमगर थे आईने इख़्लास और शराफ़त केये चंद आई गई बातें ऐसी बातें थींकि जिन की ओट चमकता था दर्द-ए-इंसानीये वारदात नहीं रज़्मिय्ये हयात के थेग़रज़ कि ये हैं मिरे बचपने की तस्वीरेंनदीम और भी कुछ ख़त्त-ओ-ख़ाल हैं उन केये मेरी माँ का है कहना कि जब मैं बच्चा थामैं ऐसे आदमी की गोद में न जाता थाजो बद-क़िमार हो एेबी हो या हो बद-सूरतमुझे भी याद है नौ दस बरस ही का मैं थातो मुझ पे करता था जादू सा हुस्न-ए-इंसानीकुछ ऐसा होता था महसूस जब मैं देखता थाशगुफ़्ता रंग तर-ओ-ताज़ा रूप वालों काकि उन की आँच मिरी हड्डियाँ गला देगीइक आज़माइश-ए-जाँ थी कि था शुऊर-ए-जमालऔर उस की नश्तरिय्यत उस की उस्तुखाँ-सोज़ीग़म ओ नशात लगावट मोहब्बत ओ नफ़रतइक इंतिशार-ए-सकूँ इज़्तिराब प्यार इताबवो बे-पनाह ज़की-उल-हिसी वो हिल्म ओ ग़ुरूरकभी कभी वो भरे घर में हिस्स-ए-तंहाईवो वहशतें मिरी माहौल-ए-ख़ुश-गवार में भीमिरी सरिश्त में ज़िद्दैन के कई जोड़ेशुरूअ ही से थे मौजूद आब-ओ-ताब के साथमिरे मिज़ाज में पिन्हाँ थी एक जदलिय्यतरगों में छूटते रहते थे बे-शुमार अनारनदीम ये हैं मिरे बाल-पन के कुछ आसारवफ़ूर ओ शिद्दत-ए-जज़्बात का ये आलम थाकि कौंदे जस्त करें दिल के आबगीने मेंवो बचपना जिसे बर्दाश्त अपनी मुश्किल होवो बचपना जो ख़ुद अपनी ही तेवरियाँ सी चढ़ाएनदीम ज़िक्र-ए-जवानी से काँप जाता हूँजवानी आई दबे पाँव और यूँ आईकि उस के आते ही बिगड़ा बना-बनाया खेलवो ख़्वाहिशात के जज़्बात के उमडते हुएवो होंकते हुए बे-नाम आग के तूफ़ाँवो फूटता हुआ ज्वाला-मुखी जवानी कारगों में उठती हुई आँधियों के वो झटकेकि जो तवाज़ुन-ए-हस्ती झिंझोड़ के रख देंवो ज़लज़ले कि पहाड़ों के पैर उखड़ जाएँबुलूग़ियत की वो टीसें वो कर्ब-ए-नश्व-ओ-नुमाऔर ऐसे में मुझे ब्याहा गया भला किस सेजो हो न सकती थी हरगिज़ मिरी शरीक-ए-हयातहम एक दूसरे के वास्ते बने ही न थेसियाह हो गई दुनिया मिरी निगाहों मेंवो जिस को कहते हैं शादी-ए-ख़ाना-आबादीमिरे लिए वो बनी बेवगी जवानी कीलुटा सुहाग मिरी ज़िंदगी का मांडो मेंनदीम खा गई मुझ को नज़र जवानी कीबला-ए-जान मुझे हो गया शुऊर-ए-जमालतलाश-ए-शोला-ए-उलफ़त से ये हुआ हासिलकि नफ़रतों का अगन-कुंड बन गई हस्तीवो हल्क़ ओ सीना ओ रग रग में बे-पनाह चुभानदीम जैसे निगल ली हो मैं ने नाग-फनीज़ इश्क़-ज़ादम ओ इशक़म कमुश्त ज़ार-ओ-दरेग़ख़बर न बुर्द ब-रुस्तम कसे कि सोहरा-बमन पूछ आलम-ए-काम-ओ-दहन नदीम मिरेसमर हयात का जब राख बिन गया मुँह मेंमैं चलती-फिरती चिता बन गया जवानी कीमैं कांधा देता रहा अपने जीते मुर्दे कोये सोचता था कि अब क्या करूँ कहाँ जाऊँबहुत से और मसाइब भी मुझ पे टूट पड़ेमैं ढूँढने लगा हर सम्त सच्ची झूटी पनाहतलाश-ए-हुस्न में शेर-ओ-अदब में दोस्ती मेंरुँधी सदा से मोहब्बत की भीक माँगी हैनए सिरे से समझना पड़ा है दुनिया कोबड़े जतन से सँभाला है ख़ुद को मैं ने नदीममुझे सँभलने में तो चालीस साल गुज़रे हैंमेरी हयात तो विश-पान की कथा है नदीममैं ज़हर पी के ज़माने को दे सका अमृतन पूछ मैं ने जो ज़हराबा-ए-हयात पियामगर हूँ दिल से मैं इस के लिए सिपास-गुज़ारलरज़ते हाथों से दामन ख़ुलूस का न छटाबचा के रक्खी थी मैं ने अमानत-ए-तिफ़्लीइसे न छीन सकी मुझ से दस्त-बुर्द-ए-शबाबब-क़ौल शाएर-ए-मुल्क-ए-फ़रंग हर बच्चाख़ुद अपने अहद-ए-जवानी का बाप होता हैये कम नहीं है कि तिफ़्ली-ए-रफ़्ता छोड़ गईदिल-ए-हज़ीं में कई छोटे छोटे नक़्श-ए-क़दममिरी अना की रगों में पड़े हुए हैं अभीन जाने कितने बहुत नर्म उँगलियों के निशाँहनूज़ वक़्त के बे-दर्द हाथ कर न सकेहयात-ए-रफ़्ता की ज़िंदा निशानियों को फ़नाज़माना छीन सकेगा न मेरी फ़ितरत सेमिरी सफ़ा मिरे तहतुश-शुऊर की इस्मततख़य्युलात की दोशीज़गी का रद्द-ए-अमलजवान हो के भी बे-लौस तिफ़ल-वश जज़्बातस्याना होने पे भी ये जिबिल्लतें मेरीये सरख़ुशी ओ ग़म बे-रिया ये क़ल्ब-गुदाज़बग़ैर बैर के अन-बन ग़रज़ से पाक तपाकग़रज़ से पाक ये आँसू ग़रज़ से पाक हँसीये दश्त-ए-दहर में हमदर्दियों का सरचश्माक़ुबूलियत का ये जज़्बा ये काएनात ओ हयातइस अर्ज़-ए-पाक पर ईमान ये हम-आहंगीहर आदमी से हर इक ख़्वाब ओ ज़ीस्त से ये लगावये माँ की गोद का एहसास सब मनाज़िर मेंक़रीब ओ दूर ज़मीं में ये बू-ए-वतनिय्यतनिज़ाम-ए-शमस-ओ-क़मर में पयाम-ए-हिफ़्ज़-ए-हयातब-चश्म-ए-शाम-ओ-सहर मामता की शबनम सीये साज़ ओ दिल में मिरे नग़्मा-ए-अनलकौनैनहर इज़्तिराब में रूह-ए-सुकून-ए-बे-पायाँज़माना-ए-गुज़राँ में दवाम का सरगमये बज़्म-ए-जश्न-ए-हयात-ओ-ममात सजती हुईकिसी की याद की शहनाइयाँ सी बजती हुईये रमज़ीत के अनासिर शुऊर-ए-पुख़्ता मेंफ़लक पे वज्द में लाती है जो फ़रिश्तों कोवो शाएरी भी बुलूग़-ए-मिज़ाज-ए-तिफ़्ली हैये नश्तरिय्यत-ए-हस्ती ये इस की शेरियतये पत्ती पत्ती पे गुलज़ार-ए-ज़िंदगी के किसीलतीफ़ नूर की परछाइयाँ सी पड़ती हुईबहम ये हैरत ओ मानूसियत की सरगोशीबशर की ज़ात कि महर-ए-उलूहियत ब-जबींअबद के दिल में जड़ें मारता हुआ सब्ज़ाग़म-ए-जहाँ मुझे आँखें दिखा नहीं सकताकि आँखें देखे हुए हूँ मैं ने अपने बचपन कीमिरे लहू में अभी तक सुनाई देती हैंसुकूत-ए-हुज़्न में भी घुंघरुओं की झंकारेंये और बात कि मैं इस पे कान दे न सकूँइसी वदीअत-ए-तिफ़्ली का अब सहारा हैयही हैं मर्हम-ए-काफ़ूर दिल के ज़ख़्मों परउन्ही को रखना है महफ़ूज़ ता-दम-ए-आख़िरज़मीन-ए-हिन्द है गहवारा आज भी हमदमअगर हिसाब करें दस करोड़ बच्चों काये बच्चे हिन्द की सब से बड़ी अमानत हैंहर एक बच्चे में हैं सद-जहान-ए-इम्कानातमगर वतन का हल-ओ-अक़्द जिन के हाथ में हैनिज़ाम-ए-ज़िंदगी-ए-हिंद जिन के बस में हैरवय्या देख के उन का ये कहना पड़ता हैकिसे पड़ी है कि समझे वो इस अमानत कोकिसे पड़ी है कि बच्चों की ज़िंदगी को बचाएख़राब होने से टलने से सूख जाने सेबचाए कौन इन आज़ुर्दा होनहारों कोवो ज़िंदगी जिसे ये दे रहे हैं भारत कोकरोड़ों बच्चों के मिटने का इक अलमिय्या हैचुराए जाते हैं बच्चे अभी घरों से यहाँकि जिस्म तोड़ दिए जाएँ उन के ताकि मिलेचुराने वालों को ख़ैरात माघ-मेले कीजो इस अज़ाब से बच जाएँ तो गले पड़ जाएँवो लानतें कि हमारे करोड़ों बच्चों कीनदीम ख़ैर से मिट्टी ख़राब हो जाएवो मुफ़्लिसी कि ख़ुशी छीन ले वो बे-बरगीउदासियों से भरी ज़िंदगी की बे-रंगीवो यासियात न जिस को छुए शुआ-ए-उमीदवो आँखें देखती हैं हर तरफ़ जो बे-नूरीवो टुकटुकी कि जो पथरा के रह गई हो नदीमवो बे-दिली की हँसी छीन ले जो होंटों सेवो दुख कि जिस से सितारों की आँख भर आएवो गंदगी वो कसाफ़त मरज़-ज़दा पैकरवो बच्चे छिन गए हों जिन से बचपने उन केहमीं ने घोंट दिया जिस के बचपने का गलाजो खाते-पीते घरों के हैं बच्चे उन को भी क्यासमाज फूलने-फलने के दे सका साधनवो साँस लेते हैं तहज़ीब-कुश फ़ज़ाओं मेंहम उन को देते हैं बे-जान और ग़लत तालीममिलेगा इल्म-ए-जिहालत-नुमा से क्या उन कोनिकल के मदरसों और यूनीवर्सिटिय्यों सेये बद-नसीब न घर के न घाट के होंगेमैं पूछता हूँ ये तालीम है कि मक्कारीकरोड़ों ज़िंदगियों से ये बे-पनाह दग़ानिसाब ऐसा कि मेहनत करें अगर इस परबजाए इल्म जहालत का इकतिसाब करेंये उल्टा दर्स-ए-अदब ये सड़ी हुई तालीमदिमाग़ की हो ग़िज़ा या ग़िज़ा-ए-जिस्मानीहर इक तरह की ग़िज़ा में यहाँ मिलावट हैवो जिस को बच्चों की तालीम कह के देते हैंवो दर्स उल्टी छुरी है गले पे बचपन केज़मीन-ए-हिन्द हिण्डोला नहीं है बच्चों काकरोड़ों बच्चों का ये देस अब जनाज़ा हैहम इंक़लाब के ख़तरों से ख़ूब वाक़िफ़ हैंकुछ और रोज़ यही रह गए जो लैल-ओ-नहारतो मोल लेना पड़ेगा हमें ये ख़तरा भीकि बच्चे क़ौम की सब से बड़ी अमानत हैं
ज़ियादा पास मत आनामैं वो तह-ख़ाना हूँ जिस मेंशिकस्ता ख़्वाहिशों के अन-गिनत आसेब बस्ते हैंजो आधी शब तो रोते हैं फिर आधी रात हँसते हैंमिरी तारीकियों मेंगुम-शुदा सदियों के गर्द-आलूद ना-आसूदा ख़्वाबों केकई इफ़रीत बस्ते हैंमिरी ख़ुशियों पे रोते हैं मिरे अश्कों पे हँसते हैंमिरे वीरान दिल में रेंगती हैं मकड़ियाँ ग़म कीतमन्नाओं के काले नाग शब-भर सरसराते हैंगुनाहों के जने बिच्छूदमों पर अपने अपने डंक लादेअपने अपने ज़हर के शो'लों में जलते हैंये बिच्छू दुख निगलते और पछतावे उगलते हैं
मेरे वतन, प्यारे वतनराहत के गहवारे वतनहर दिल के उजयारे वतनहर आँख के तारे वतनगुल-पोश तेरी वादियाँफ़रहत-निशाँ राहत-रसाँतेरे चमन-ज़ारों पे हैगुलज़ार-ए-जन्नत का गुमाँहर शाख़ फूलों की छड़ीहर नख़्ल-ए-तूबा है यहाँकौसर के चश्मे जा-ब-जातसनीम हर आब-ए-रवाँहर बर्ग रूह-ए-ताज़गीहर फूल जान-ए-गुल्सिताँहर बाग़ बाग़-ए-दिल-कशीहर बाग़ बाग़-ए-बे-ख़िज़ाँदिलकश चरागाहें तिरीढोरों के जिन में कारवाँअंजुम-सिफ़त गुलहा-ए-नौहर तख़्ता-ए-गुल आसमाँनक़्श-ए-सुरय्या जा-ब-जाहर हर रविश इक कहकशाँतेरी बहारें दाइमीतेरी बहारें जावेदाँतुझ में है रूह-ए-ज़िंदगीपैहम रवाँ पैहम दवाँदरिया वो तेरे तुंद-ख़ूझीलें वो तेरी बे-कराँशाम-ए-अवध के लब पे हैहुस्न-ए-अज़ल की दास्ताँकहती है राज़-ए-सरमदीसुब्ह-ए-बनारस की ज़बाँउड़ता है हफ़्त-अफ़्लाक परउन कार-ख़ानों का धुआँजिन में हैं लाखों मेहनतीसनअत-गरी के पासबाँतेरी बनारस की ज़रीरश्क-ए-हरीर-ओ-परनियाँबीदर की फ़नकारी में हैंसनअत की सब बारीकियाँअज़्मत तिरे इक़बाल कीतेरे पहाड़ों से अयाँदरियाओं का पानी, तरीतक़्दीस का अंदाज़ा-दाँक्या 'भारतेंदु' ने कियागंगा की लहरों का बयाँ'इक़बाल' और चकबस्त हैंअज़्मत के तेरी नग़्मा-ख़्वाँ'जोश' ओ 'फ़िराक़' ओ 'पंत' हैंतेरे अदब के तर्जुमाँ'तुलसी' ओ 'ख़ुसरव' हैं तेरीतारीफ़ में रत्ब-उल-लिसाँगाते हैं नग़्मा मिल के सबऊँचा रहे तेरा निशाँमेरे वतन, प्यारे वतनराहत के गहवारे वतनहर दिल के उजियारे वतनहर आँख के तारे वतनतेरे नज़ारों के नगींदुनिया की ख़ातम में नहींसारे जहाँ में मुंतख़बकश्मीर की अर्ज़-ए-हसींफ़ितरत का रंगीं मोजज़ाफ़िरदौस बर-रू-ए-ज़मींफ़िरदौस बर-रू-ए-ज़मींहाँ हाँ हमीं अस्त ओ हमींसरसब्ज़ जिस के दश्त हैंजिस के जबल हैं सुर्मगींमेवे ब-कसरत हैं जहाँशीरीं मिसाल-ए-अंग्बींहर ज़ाफ़राँ के फूल मेंअक्स-ए-जमाल-ए-हूरईंवो मालवे की चाँदनीगुम जिस में हों दुनिया-ओ-दींइस ख़ित्ता-ए-नैरंग मेंहर इक फ़ज़ा हुस्न-आफ़रींहर शय में हुस्न-ए-ज़िंदगीदिलकश मकाँ दिलकश ज़मींहर मर्द मर्द-ए-ख़ूब-रूहर एक औरत नाज़नींवो ताज की ख़ुश-पैकरीहर ज़ाविए से दिल-नशींसनअत-गरों के दौर कीइक यादगार-ए-मरमरींहोती है जो हर शाम कोफ़ैज़-ए-शफ़क़ से अहमरींदरिया की मौजों से अलगया इक बत-ए-नज़्ज़ारा-बींया ताएर-ए-नूरी कोईपर्वाज़ करने के क़रींया अहल-ए-दुनिया से अलगइक आबिद-ए-उज़्लत-गुज़ीनक़्श-ए-अजंता की क़समजचता नहीं अर्ज़ंग-ए-चींशान-ए-एलोरा देख करझुकती है आज़र की जबींचित्तौड़ हो या आगराऐसे नहीं क़िलए कहींबुत-गर हो या नक़्क़ाश होतू सब की अज़्मत का अमींमेरे वतन, प्यारे वतनराहत के गहवारे वतनहर दिल के अजियारे वतनहर आँख के तारे वतनदिलकश तिरे दश्त ओ चमनरंगीं तिरे शहर ओ चमनतेरे जवाँ राना जवाँतेरे हसीं गुल पैरहनइक अंजुमन दुनिया है येतू इस में सद्र-ए-अंजुमनतेरे मुग़न्नी ख़ुश-नवाशाएर तिरे शीरीं-सुख़नहर ज़र्रा इक माह-ए-मुबींहर ख़ार रश्क-ए-नस्तरींग़ुंचा तिरे सहरा का हैइक नाफ़ा-ए-मुश्क-ए-ख़ुतनकंकर हैं तेरे बे-बहापत्थर तिरे लाल-ए-यमनबस्ती से जंगल ख़ूब-तरबाग़ों से हुस्न अफ़रोज़ बनवो मोर वो कब्क-ए-दरीवो चौकड़ी भरते हिरनरंगीं-अदा वो तितलियाँबाँबी में वो नागों के फनवो शेर जिन के नाम सेलरज़े में आए अहरमनखेतों की बरकत से अयाँफ़ैज़ान-ए-रब्ब-ए-ज़ुल-मिननचश्मों के शीरीं आब सेलज़्ज़त-कशाँ काम-ओ-दहनताबिंदा तेरा अहद-ए-नौरौशन तिरा अहद-ए-कुहनकितनों ने तुझ पर कर दियाक़ुर्बान अपना माल धनकितने शहीदों को मिलेतेरे लिए दार-ओ-रसनकितनों को तेरा इश्क़ थाकितनों को थी तेरी लगनतेरे जफ़ा-कश मेहनतीरखते हैं अज़्म-ए-कोहकनतेरे सिपाही सूरमाबे-मिस्ल यक्ता-ए-ज़मन'भीषम' सा जिन में हौसला'अर्जुन' सा जिन में बाँकपनआलिम जो फ़ख़्र-ए-इल्म हैंफ़नकार नाज़ाँ जिन पे फ़न'राय' ओ 'बोस' ओ 'शेरगिल''दिनकर', 'जिगर' 'मैथली-शरण''वलाठोल', 'माहिर', भारती'बच्चन', 'महादेवी', 'सुमन''कृष्णन', 'निराला', 'प्रेम-चंद''टैगोर' ओ 'आज़ाद' ओ 'रमन'मेरे वतन, प्यारे वतनराहत के गहवारे वतनहर दिल के अजियारे वतनहर आँख के तारे वतनखेती तिरी हर इक हरीदिलकश तिरी ख़ुश-मंज़रीतेरी बिसात-ए-ख़ाक केज़र्रे हैं महर-ओ-मुश्तरीझेलम कावेरी नाग वोगंगा की वो गंगोत्रीवो नर्बदा की तमकनतवो शौकत-ए-गोदावरीपाकीज़गी सरजू की वोजमुना की वो ख़ुश-गाैहरीदुल्लर्बा आब-ए-नील-गूँकश्मीर की नीलम-परीदिलकश पपीहे की सदाकोयल की तानें मद-भरीतीतर का वो हक़ सिर्रहुतूती का वो विर्द-ए-हरीसूफ़ी तिरे हर दौर मेंकरते रहे पैग़म्बरी'चिश्ती' ओ 'नानक' से मिलीफ़क़्र-ओ-ग़िना को बरतरीअदल-ए-जहाँगीरी में थीमुज़्मर रेआया-पर्वरीवो नव-रतन जिन से हुईतहज़ीब-ए-दौर-ए-अकबरीरखते थे अफ़्ग़ान-ओ-मुग़लइक सौलत-ए-अस्कंदरीरानाओं के इक़बाल कीहोती है किस से हम-सरीसावंत वो योद्धा तिरेतेरे जियाले वो जरीनीती विदुर की आज तककरती है तेरी रहबरीअब तक है मशहूर-ए-ज़माँ'चाणक्य' की दानिश-वरीवयास और विश्वामित्र सेमुनियों की शान-ए-क़ैसरीपातंजलि ओ साँख सेऋषियों की हिकमत-पर्वरीबख़्शे तुझे इनआम-ए-नौहर दौर चर्ख़-ए-चम्बरीख़ुश-गाैहरी दे आब कोऔर ख़ाक को ख़ुश-जौहरीज़र्रों को महर-अफ़्शानियाँक़तरों को दरिया-गुस्तरीमेरे वतन, प्यारे वतनराहत के गहवारे वतनहर दिल के अजियारे वतनहर आँख के तारे वतनतू रहबर-ए-नौ-ए-बशरतू अम्न का पैग़ाम-बरपाले हैं तू ने गोद मेंसाहिब-ख़िरद साहिब-ए-नज़रअफ़ज़ल-तरीं इन सब में हैबापू का नाम-ए-मो'तबरहर लफ़्ज़ जिस का दिल-नशींहर बात जिस की पुर-असरजिस ने लगाया दहर मेंनारा ये बे-ख़ौफ़-ओ-ख़तरबे-कार हैं तीर-ओ-सिनाँबे-सूद हैं तेग़-ओ-तबरहिंसा का रस्ता झूट हैहक़ है अहिंसा की डगरदरमाँ है ये हर दर्द काये हर मरज़ का चारा-गरजंगाह-ए-आलम में कोईइस से नहीं बेहतर सिपरकरता हूँ मैं तेरे लिएअब ये दुआ-ए-मुख़्तसररौनक़ पे हों तेरे चमनसरसब्ज़ हों तेरे शजरनख़्ल-ए-उमीद-ए-बेहतरीहर फ़स्ल में हो बारवरकोशिश हो दुनिया में कोईख़ित्ता न हो ज़ेर-ओ-ज़बरतेरा हर इक बासी रहेनेको-सिफ़त नेको-सियरहर ज़न सलीक़ा-मंद होहर मर्द हो साहिब-हुनरजब तक हैं ये अर्ज़ ओ फ़लकजब तक हैं ये शम्स ओ क़मरमेरे वतन, प्यारे वतनराहत के गहवारे वतनहर दिल के उजयारे वतनहर आँख के तारे वतन
1सियाह पेड़ हैं अब आप अपनी परछाईंज़मीं से ता-मह-ओ-अंजुम सुकूत के मीनारजिधर निगाह करें इक अथाह गुम-शुदगीइक एक कर के फ़सुर्दा चराग़ों की पलकेंझपक गईं जो खुली हैं झपकने वाली हैंझलक रहा है पड़ा चाँदनी के दर्पन मेंरसीले कैफ़ भरे मंज़रों का जागता ख़्वाबफ़लक पे तारों को पहली जमाहियाँ आईं2तमोलियों की दूकानें कहीं कहीं हैं खुलीकुछ ऊँघती हुई बढ़ती हैं शाह-राहों परसवारियों के बड़े घुंघरूओं की झंकारेंखड़ा है ओस में चुप-चाप हर सिंगार का पेड़दुल्हन हो जैसे हया की सुगंध से बोझलये मौज-ए-नूर ये भरपूर ये खिली हुई रातकि जैसे खिलता चला जाए इक सफ़ेद कँवलसिपाह-ए-रूस है अब कितनी दूर बर्लिन सेजगा रहा है कोई आधी रात का जादूछलक रही है ख़ुम-ए-ग़ैब से शराब-ए-वजूदफ़ज़ा-ए-नीम नर्गिस-ए-ख़ुमारआलूदकँवल की चुटकियों में बंद है नदी का सुहाग3ये रस का सेज ये सुकुमार ये सुकोमल गातनयन कमल की झपक काम-रूप का जादूये रस्मसाई पलक की घनी घनी परछाईंफ़लक पे बिखरे हुए चाँद और सितारों कीचमकती उँगलियों से छिड़ के साज़ फ़ितरत केतराने जागने वाले हैं तुम भी जाग उठो4शुआ-ए-महर ने यूँ उन को चूम चूम लियानदी के बीच कुमुदनी के फूल खिल उठ्ठेन मुफ़्लिसी हो तो कितनी हसीन है दुनियाये झाएँ झाएँ सी रह रह के एक झींगुर कीहिना की टट्टियों में नर्म सरसराहट सीफ़ज़ा के सीने में ख़ामोश सनसनाहट सीये काएनात अब इक नींद ले चुकी होगी5ये महव-ए-ख़्वाब हैं रंगीन मछलियाँ तह-ए-आबकि हौज़-ए-सेहन में अब इन की चश्मकें भी नहींये सर-निगूँ हैं सर-ए-शाख़ फूल गुड़हल केकि जैसे बे-बुझे अंगारे ठंडे पड़ जाएँये चाँदनी है कि उमडा हुआ है रस-सागरइक आदमी है कि इतना दुखी है दुनिया में6क़रीब चाँद के मंडला रही है इक चिड़ियाभँवर में नूर के करवट से जैसे नाव चलेकि जैसे सीना-ए-शाइर में कोई ख़्वाब पलेवो ख़्वाब साँचे में जिस के नई हयात ढलेवो ख़्वाब जिस से पुराना निज़ाम-ए-ग़म बदलेकहाँ से आती है मदमालती लता की लिपटकि जैसे सैकड़ों परियाँ गुलाबियाँ छिड़काएँकि जैसे सैकड़ों बन-देवियों ने झूले परअदा-ए-ख़ास से इक साथ बाल खोल दिएलगे हैं कान सितारों के जिस की आहट परइस इंक़लाब की कोई ख़बर नहीं आतीदिल-ए-नुजूम धड़कते हैं कान बजते हैं7ये साँस लेती हुई काएनात ये शब-ए-माहये पुर-सुकूँ ये पुर-असरार ये उदास समाँये नर्म नर्म हवाओं के नील-गूँ झोंकेफ़ज़ा की ओट में मर्दों की गुनगुनाहट हैये रात मौत की बे-रंग मुस्कुराहट हैधुआँ धुआँ से मनाज़िर तमाम नम-दीदाख़ुनुक धुँदलके की आँखें भी नीम ख़्वाबीदासितारे हैं कि जहाँ पर है आँसुओं का कफ़नहयात पर्दा-ए-शब में बदलती है पहलूकुछ और जाग उठा आधी रात का जादूज़माना कितना लड़ाई को रह गया होगामिरे ख़याल में अब एक बज रहा होगा8गुलों ने चादर-ए-शबनम में मुँह लपेट लियालबों पे सो गई कलियों की मुस्कुराहट भीज़रा भी सुम्बुल-ए-तुर्की लटें नहीं हिलतींसुकूत-ए-नीम-शबी की हदें नहीं मिलतींअब इंक़लाब में शायद ज़ियादा देर नहींगुज़र रहे हैं कई कारवाँ धुँदलके मेंसुकूत-ए-नीम-शबी है उन्हीं के पाँव की चापकुछ और जाग उठा आधी रात का जादू9नई ज़मीन नया आसमाँ नई दुनियानए सितारे नई गर्दिशें नए दिन रातज़मीं से ता-ब-फ़लक इंतिज़ार का आलमफ़ज़ा-ए-ज़र्द में धुँदले ग़ुबार का आलमहयात मौत-नुमा इंतिशार का आलमहै मौज-ए-दूद कि धुँदली फ़ज़ा की नब्ज़ें हैंतमाम ख़स्तगी-ओ-माँदगी ये दौर-ए-हयातथके थके से ये तारे थकी थकी सी ये रातये सर्द सर्द ये बे-जान फीकी फीकी चमकनिज़ाम-ए-सानिया की मौत का पसीना हैख़ुद अपने आप में ये काएनात डूब गईख़ुद अपनी कोख से फिर जगमगा के उभरेगीबदल के केचुली जिस तरह नाग लहराए10ख़ुनुक फ़ज़ाओं में रक़्साँ हैं चाँद की किरनेंकि आबगीनों पे पड़ती है नर्म नर्म फुवारये मौज-ए-ग़फ़लत-ए-मासूम ये ख़ुमार-ए-बदनये साँस नींद में डूबी ये आँख मदमातीअब आओ मेरे कलेजे से लग के सो जाओये पलकें बंद करो और मुझ में खो जाओ
तुम समझती हो ये गुल-दान में हँसते हुए फूलमेरी अफ़्सुर्दगी-ए-दिल को मिटा ही देंगेये हसीं फूल कि हैं जान-ए-गुलिस्तान-ए-बहारमेरे सोए हुए नग़्मों को जगा ही देंगेतुम ने देखी हैं दमकती हुई शमएँ लेकिनतुम ने देखे नहीं बुझते हुए दीपक हमदमवही दीपक जो निगाहों का सहारा पा करएक लम्हे के लिए जलते हैं बुझ जाते हैंकभी इक अश्क से धुल जाते हैं सदियों के ग़ुबारकाएनात और निखर और सँवर जाती हैकभी नाकाम तमन्ना की सदा-ए-मुबहमक़हक़हा बन के फ़ज़ाओं में बिखर जाती हैटूटते तारों के संगीत सुने हैं तुम नेवो भी नग़्मे हैं जो होंटों से गुरेज़ाँ ही रहेफड़फड़ाते हुए देखे हैं फ़ज़ाओं में कभीवो फ़साने जो निगाहों से बयाँ हो न सकेकभी काँटों से बहल जाती है रूह-ए-ग़मगींऔर मा'सूम शगूफ़ों की रसीली ख़ुश्बूनेश्तर बन के रग-ए-जाँ में उतर जाती हैहाँ यही फूल यही जान-ए-गुलिस्तान-ए-बहारनाग बन कर कभी एहसास को डस लेते हैं
मोहब्बत आह तेरी ये मोहब्बत रात भर की हैतिरी रंगीन ख़ल्वत की लताफ़त रात भर की हैतिरे शादाब होंटों की इनायत रात भर की हैतिरे मस्ताना बोसों की हलावत रात भर की हैमह-ए-रौशन है तू और तेरी तलअत रात भर की हैगुल-ए-शब्बू है तू और तेरी निकहत रात भर की हैतू क्या जाने कि सौदा-ए-मोहब्बत किस को कहते हैंमोहब्बत और मोहब्बत की लताफ़त किस को कहते हैंग़म-ए-हिज्राँ है क्या और सोज़-ए-उल्फ़त किस को कहते हैंजुनूँ होता है कैसा और वहशत किस को कहते हैंतू क्या जाने ग़म-ए-शब-हा-ए-फ़ुर्क़त किस को कहते हैंतिरे इज़हार-ए-उल्फ़त की फ़साहत रात भर की हैनिगाह-ए-मस्त से दिल को मिरे तड़पा रही है तूअदा-ए-शौक़ से जज़्बात को भड़का रही है तूमुझे बच्चे की सूरत नाज़ से फुसला रही है तूखिलौने दे के बोसों के मुझे बहला रही है तूमगर नादान है तू आह धोका खा रही है तूतिरा रू-ए-दरख़्शाँ है ब-ज़ाहिर माहताब-आसातिरे होंटों की शादाबी है रंगत में शराब-आसातिरे रुख़्सार की महताबियाँ हैं आफ़्ताब-आसामगर इन की हक़ीक़त है हबाब-आसा सराब-आसाकि ग़ाज़े की सबाहत उस पे छाई है नक़ाब-आसाऔर इस ग़ाज़े की भी झूटी सबाहत रात भर की हैये माना तेरी ख़ल्वत की फ़ज़ा रूह-ए-गुलिस्ताँ हैतिरी ख़ल्वत का हर फ़ानूस इक महताब-ए-लर्ज़ां हैतिरा अबरेशमी बिस्तर नहीं इक ख़्वाब-ए-ख़ंदाँ हैतिरा जिस्म आफ़त-ए-दिल तेरा सीना आफ़त-ए-जाँ हैतू इक ज़िंदा सितारा है जो तन्हाई में ताबाँ हैमगर कहते हैं तारों की हुकूमत रात भर की हैलताफ़त से हैं ख़ाली तेरे कुम्हलाए हुए बोसेतरावत से हैं ख़ाली तेरे मुरझाए हुए बोसेनज़ाकत से हैं ख़ाली तेरे घबराए हुए बोसेहक़ीक़त से हैं ख़ाली तेरे शरमाए हुए बोसेमोहब्बत से हैं ख़ाली तेरे घबराए हुए बोसेऔर इन बोसों की ये झूटी हलावत रात भर की हैतिरे ज़हरीले बोसे मुझ को जिस दम याद आएँगेमिरे होंटों पे काले नाग बन कर थरथराएँगेपशेमानी के जज़्बे मुझ को दीवाना बनाएँगेमिरे इंकार को नफ़रत के ख़ंजर गुदगुदाएँगेमिरे दिल की रगों में ग़म के शोले तैर जाएँगेमैं समझा! आह समझा! ये मसर्रत रात भर की हैमुझे दीवाना करने की मसर्रत बे-ख़बर कब तकरहेगी मेरे दिल में तेरी उल्फ़त कारगर कब तकमुझे मसहूर रक्खेगा ये इश्क़-ए-बे-समर कब तकहक़ीक़त की सहर आख़िर न होगी पर्दा-दर कब तकमुझे मग़्लूब कर के ख़ुश है तू ज़ालिम मगर कब तकतिरी ये फ़तह मेरी ये हज़ीमत रात भर की है
मैं हूँ एक अजीब सपेरानाग पालना काम है मेरापीले पीले काले कालेरंग बिरंगे धब्बों वालेशो'लों सी फ़नकारों वालेज़हरीली महकारों वालेउन की आँखें तेज़ नशीलीगहरी झीलों ऐसी नीलीनए लहू से लाल ज़बानेंजैसे मौत की रंगीं तानेंमख़मल के रुमालों जैसेसुर्ख़ गुलाबी गालों जैसेमुझ को तकते रहते हैं येमुझ को डसते रहते हैं येमुझ पे हँसते रहते हैं ये
मुकद्दर है फ़ज़ा-ए-आलम-ए-इम्काँ सियासत सेबहुत बे-आबरू है आज-कल इंसाँ सियासत सेज़मीर-ओ-ज़र्फ़ की उस के यहाँ क़ीमत नहीं कोईजहाँ में दर-ब-दर हैं साहब-ए-ईमाँ सियासत सेये एहसासात-ए-तहज़ीब-ओ-तमद्दुन को मिटाती हैसियासत आज-कल की कैसे कैसे गुल खिलाती हैनहीं शेवा सियासत का मोहब्बत और रवादारीसिखाती है परस्तारों को अपने ये रिया-कारीन इस का कोई मस्लक है न इस का कोई मज़हब हैदिल-ए-हर्स-ओ-हवस में बन के रहती है ये चिंगारीकिसी का घर गिराती है किसी का घर सजाती हैसियासत आज-कल की कैसे कैसे गुल खिलाती हैलड़ाती है यही इक दूसरे को ज़ात-ओ-मज़हब परइसी की शह पे क़त्ल-ए-आम होता है यहाँ अक्सररऊनत ये सिखाती है मुनाफ़िक़ हुक्मरानों कोइसी के बत्न से होते हैं पैदा जब्र-ओ-ज़ुलम-ओ-शरये अपने मुहसिनों का ख़ून पी कर मुस्कुराती हैसियासत आज-कल की कैसे कैसे गुल खिलाती हैसदा ये इत्तिहाद-ए-बाहमी पर वार करती हैतअ'स्सुब को हवा देती है दिल बेज़ार करती हैकहीं ता'मीर करती है इबादत-गाह फ़ित्नों सेकहीं ख़ुद ही इबादत-गाह को मिस्मार करती हैफ़रेब-ओ-मक्र से अपने ये हर-सू क़हर ढाती हैसियासत आज-कल की कैसे कैसे गुल खिलाती हैइसी के दम से फ़स्लें लहलहाती हैं फ़सादों कीयही तकमील करती है हुकूमत के इरादों कीइसी की मस्लहत से बुग़्ज़ के पौदे पनपते हैंगिरा देती है ये दीवार बाहम एतिमादों कीहवा दे कर ये बद-उनवानियों की लौ बढ़ाती हैसियासत आज-कल की कैसे कैसे गुल खिलाती हैइशारे पर इसी के शहर क़स्बे गाँव जलते हैंइसी की आस्तीं में साज़िशों के नाग पलते हैंसितमगारों पे करती है ये साया अपने आँचल काइसी की आड़ में अशरार-ओ-क़ातिल बच निकलते हैंये क़ानून-ओ-अदालत को भी अब आँखें दिखाती हैसियासत आज-कल की कैसे कैसे गुल खिलाती हैजसारत को यही दहशत-गरी का नाम देती हैये हम-साए को ख़ुद ही जंग का पैग़ाम देती हैबदलती है यही तक़दीर अर्बाब-ए-क़यादत कीये अपने वारिसों को सरख़ुशी का जाम देती हैये वा'दों के घरौंदे रेगज़ारों में बनाती हैसियासत आज-कल की कैसे कैसे गुल खिलाती है
वक़्त है नाग तिरे जिस्म को डसता होगायख़ कर तुझ को हवाएँ भी बिफरती होंगीसब तिरे साए को आसेब समझते होंगेतुझ से हम-जोलियाँ कतरा के गुज़रती होंगीकितनी यादें तिरे अश्कों से उभरती होंगी
चौंक कर अंगड़ाइयाँ लेते हैं नागजाग 'अनतोनी' मोहब्बत सो रही है जाग जाग
हिन्द का उजड़ा चमन आबाद करने के लिएदर्द के मारे हुओं को शाद करने के लिएइक नया अहद-ए-जहाँ आबाद करने के लिएक़स्र-ए-इस्तिब्दाद को बरबाद करने के लिएझूम कर उट्ठो वतन आज़ाद करने के लिएसफ़्हा-ए-हस्ती से बातिल को मिटाने के लिएख़िर्मन-ए-आ'दा पे अब बिजली गिराने के लिएअहल-ए-ज़र की बे-कसी पर मुस्कुराने के लिएया'नी अर्वाह-ए-सलफ़ को शाद करने के लिएझूम कर उट्ठो वतन आज़ाद करने के लिएफिर से भड़काओ दिलों में ग़ैरतों की आग कोरज़्म की जानिब बढ़ाओ जुरअतों की बाग कोपाँव के नीचे कुचल दो सीम-ओ-ज़र के नाग कोज़िंदगानी को सरापा शाद करने के लिएझूम कर उट्ठो वतन आज़ाद करने के लिएमस्ती-ए-सहबा-ए-आज़ादी से लहराते चलोअब्र की सूरत बुलंद-ओ-पस्त पर छाते चलोक़हक़हों से लैली-ए-मग़रिब को शरमाते चलोफिर दयार-ए-हिन्द को आबाद करने के लिएझूम कर उट्ठो वतन आज़ाद करने के लिए
तू ने मेरे दुख की ख़ातिरकितने रंज सहेअपनी गोद में तू ने मुझ कोअपने लहू की चाँदनी बख़्शीमैं इक चाँद बनाजिस ने धरती से ये घोर भयानक अँधियारों का ख़ौफ़ मिटायाजब तू ज़ीनत हजला बनीतू ने अपने ख़ून की आतिश मुझ को बख़्शीमैं इक सूरज बन कर चमकाजिस की धूप में मेरी रूह का क़ैदी शाहींनाग के फंदे से छूटा
सुनो हमदम मैं रस्ता भूल बैठी हूँउदासी का घना जंगलमिरे एहसास पे तारीकियों के अन-गिनत साए बिछाता हैमुझे आसेब की सूरत डराता हैहवा की चीख़ मेरी नींद को ऐसे निगलती हैकि जैसे आग सूखी लकड़ियों को राख करती हैजहाँ मैं पाँव रखती हूँवहाँ पर वसवसों के नाग फन फैलाए बैठे हैंमैं जितने ज़ोर से आवाज़ देती हूँमिरी ख़ामोशियाँ अपने तसलसुल में मुझे आने नहीं देतींमिरी आवाज़ घुट जाती है अंदर ही कहीं पर डूब जाती हैसुनो हमदममैं तन्हा हूँकभी आओ पकड़ कर हाथ ले जाओमुझे तारीकियों की रात से रौशन दिनों तक साथ ले जाओ
आह! गंगा ये हसीं पैकर-ए-बिल्लोर तिरातेरी हर मौज-ए-रवाँ जलवा-ए-मग़रूर तिराजौर-ए-मग़रिब से मगर दिल है बहुत चूर तिराझाँकता है तिरे गिर्दाब से नासूर तिराज़ुल्म ढाए हैं सफ़ीनों ने सितमगारों केज़ख़्म अब तक तिरे सीने पे हैं पतवारों केमहव रहते थे सितारे तिरी मय पीने मेंचाँद मुँह देखता था तेरे ही आईने मेंख़ल्वत-ए-महर दरख़्शाँ थी तिरे सीने मेंतेरी ताबानियाँ आती न थीं तख़मीने मेंआज रोती है मगर तेरी जवानी तुझ कोखा गया आ के यहाँ 'टेम्स' का पानी तुझ कोआह ऐ कोह-ए-हिमाला के ग़ुरूर-ए-सय्यालतेरे दामन पे कभी बैठी न थी गर्द-ए-मलालमुँह तिरा पोंछता था चाँद का सीमीं रूमालज़ख़्म सीने पे लिए आज हैं धारे तेरेउफ़ कहाँ डूब गए चाँद सितारे तेरेरेग-ए-दोज़ख़ को छुपाए है क़बा के अंदरहौल-नाक आज है कितना ये दहकता मंज़रशाम ही शाम नज़र आती है क्यूँ साहिल पर?क्यूँ तिरी मौजों से छन्ते नहीं अनवार-ए-सहर?रौशनी क्यूँ हुई जाती है गुरेज़ाँ तुझ सेक्यूँ अँधेरों के हैं लिपटे हुए तूफ़ाँ तुझ सेआज साहिल पे नज़र आती है जलती हुई आगआदमिय्यत का सुलगता है हवाओं में सुहागआज है साज़-ए-सियासत का भयानक सा रागफन उठाए हुए बल खाते हैं शोलों के नागआज इंसान को डसती हैं हवाएँ तेरीज़हर से कितनी हैं लबरेज़ फ़ज़ाएँ तेरीआई है टेम्स से इक मौज-ए-रवाँ गाती हुईतुझ को आज़ादी के पैग़ाम से बहलाती हुईरूह मय-ख़ाना लिए शौक़ को बहकाती हुईनाज़ करती हुई हँसती हुई इठलाती हुईलाख उलझा करें ज़ुल्फ़ों में उलझने वालेइस के इश्वों को समझते हैं समझने वालेलेकिन ऐ बिन्त-ए-हिमाला तिरी अज़्मत की क़समसैल के साँचे में ढाली हुई रिफ़अत की क़समतेरे जल्वों की क़सम, तेरी लताफ़त की क़समतेरी मौजों से उभरती हुई हिम्मत की क़समअब तिरी आँखों को नमनाक न होने देंगेदामन-ए-नाज़ तिरा चाक न होने देंगे
फिर बदलने हैं मुझे बेकस-ओ-मजबूर के भागआज भी डसते हैं नादार को ज़रदार के नाग
हर तरफ़ शोला-ज़बाँ नाग हैं फन झूमते हैंसर उठाते हैं नए राग नई रागनियाँ
हैरान हूँये कौन सा शहर है'मीर'-ओ-'ग़ालिब' की दिल्ली कभी ऐसी तो न थीहर गली हर नुक्कड़ पर साँप कुंडली मारे बैठे हैं यहाँपैदा होते ही कोई भी सँपोलाडसने के लिए पर तोलने लगता हैजिधर देखिएहर जगह साँप ही साँप हैंकहीं ख़ूनी दरवाज़े के अक़ब सेतो कहीं धौला-कुआँ के फ़्लाई ओवर परहर जगह कुंडली मारे हुए यहाँहज़ार-हा साँप ऐसे हैंजो हर दम तय्यार बैठे हैंमौक़ा मिलते हीवो किसी भी नर्म-ओ-गुदाज़ बदन कोनिशाना अपना बना लेते हैंअपने ज़हरीले दाँत गाड़ ने के लिएजब वो फनफना कर बाहर आते हैंकिसी भी राहगीर का रस्ता रोकेएक दमतन के खड़े हो जाते हैंहत्ता किबूढ़ा नाग भी अब यहाँअपने खंडर में तन के खड़ा हैउसे भी इंतिज़ार हैबरसात की उस काली अँधेरी रात का हैजब वो बुल-हवसअपने कोहना-मश्क़ दाँतों कोकिसी नर्म-ओ-नाज़ुक ग़ज़ाला परतेज़ कर सके हमला-ए-ख़ूँ-रेज़ कर सकेअपनी उम्र के इस आख़िरी पड़ाव में वो बुल-हवसकोई वारदात-ए-जुनूँ-अंगेज़ क़यामत-ख़ेज़ कर सकेया ख़ुदाये कौन सा मक़ाम हैक्या ये तेरा क़हर नहीं हैक्या ये वही पुराना शहर नहीं हैसोचता हूँ'मीर'-ओ-'ग़ालिब' की दिल्ली कभी ऐसी तो न थी
धनक टूट कर सेज बनीझूमर चमकासन्नाटे चौंकेआधी रात की आँख खुलीबिरह की आँच की नीली लौनय बनती हैलय बनती हैशहनाई जलती रोती थीअब सर निव्ढ़ाएलाल पपोटे बंद किए बैठी हैनर्म गर्म हाथों की मेहंदीएक नया संगीत सुनातीदिल के किवाड़ पे रुक कर कोई रातों में दस्तक देता थादिल के किवाड़ पे रुक कर वो दस्तक देता हैपट खुलते हैंआँख से आँख दिलों सेदिल मिलते हैंघूँघट में झूमर छुपता हैघूँघट में मुखड़े छुपते हैंदौलत-ख़ाँ की देवढ़ी के खंडरों मेंबुड्ढा नाग खड़ा रोता हैगूँगे सन्नाटे बोल उठेघूँघट मुखड़े झूमर पायलचमक-दमक झंकार अमर हैप्यार अमर हैप्यार अमर हैप्यार की रात की आँख उमड आती हैऔर दो फूलतन्नूर-ए-बदनशबनम पी कर सो जाते हैं
रेल गुज़रीदनदनातीचीख़ बर्मातीइक हुमकता मुस्कुराता फूल थामेहाथ की हल्की सी जुम्बिश(सलाम आख़िरी)चाक़ूओं की धार पेशानी में धँस कर रह गईरोज़ ओ शब मामूल के सब साएबानों में दराड़ें पड़ गईंफन उठाए पटरियों के नाग बल खाने लगे
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