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नज़्म
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
क्या जाने किस ख़याल में गुम थी वो बे-गुनाह
नूर-ए-नज़र ये दीदा-ए-हसरत से की निगाह
चकबस्त बृज नारायण
नज़्म
तमाम कूज़े बनते बनते 'तू' ही बन के रह गए
नशात इस विसाल-ए-रह-गुज़र की ना-गहाँ मुझे निगल गई
नून मीम राशिद
नज़्म
गुनाह के तुंद-ओ-तेज़ शोलों से रूह मेरी भड़क रही थी
हवस की सुनसान वादियों में मिरी जवानी भटक रही थी
नून मीम राशिद
नज़्म
रहज़नों का क़स्र-ए-शूरा क़ातिलों की ख़्वाब-गाह
खिलखिलाते हैं जराएम जगमगाते हैं गुनाह