aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "saamne"
हर बार मेरे सामने आती रही हो तुमहर बार तुम से मिल के बिछड़ता रहा हूँ मैंतुम कौन हो ये ख़ुद भी नहीं जानती हो तुममैं कौन हूँ ये ख़ुद भी नहीं जानता हूँ मैंतुम मुझ को जान कर ही पड़ी हो अज़ाब मेंऔर इस तरह ख़ुद अपनी सज़ा बन गया हूँ मैं
जला दो इसे फूँक डालो ये दुनियामिरे सामने से हटा लो ये दुनियातुम्हारी है तुम ही सँभालो ये दुनियाये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है
मुफ़्लिसी और ये मज़ाहिर हैं नज़र के सामनेसैकड़ों सुल्तान-ए-जाबिर हैं नज़र के सामनेसैकड़ों चंगेज़ ओ नादिर हैं नज़र के सामनेऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
सुनो 'ज़रयून' तुम तो ऐन-ए-अ'यान-ए-हक़ीक़त होनज़र से दूर मंज़र का सर-ओ-सामान-ए-सर्वत होहमारी उम्र का क़िस्सा हिसाब अंदोज़-ए-आनी हैज़मानी ज़द में ज़न की इक गुमान-ए-लाज़िमानी हैगुमाँ ये है कि बाक़ी है बक़ा हर आन फ़ानी हैकहानी सुनने वाले जो भी हैं वो ख़ुद कहानी हैंकहानी कहने वाला इक कहानी की कहानी हैपिया पे ये गदाज़िश ये गुमाँ और ये गिले कैसेसिला-सोज़ी तो मेरा फ़न है फिर इस के सिले कैसे
तुम अहल-ए-हर्फ़ कि पिंदार के सना-गर थेवो आसमान-ए-हुनर के नुजूम सामने हैंबस इक मुसाहिब-ए-दरबार के इशारे परगदागरान-ए-सुख़न के हुजूम सामने हैं
ये किस तरह याद आ रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही होकि जैसे सच-मुच निगाह के सामने खड़ी मुस्कुरा रही होये जिस्म-ए-नाज़ुक, ये नर्म बाहें, हसीन गर्दन, सिडौल बाज़ूशगुफ़्ता चेहरा, सलोनी रंगत, घनेरा जूड़ा, सियाह गेसूनशीली आँखें, रसीली चितवन, दराज़ पलकें, महीन अबरूतमाम शोख़ी, तमाम बिजली, तमाम मस्ती, तमाम जादूहज़ारों जादू जगा रही होये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो
हुआ ख़ेमा-ज़न कारवान-ए-बहारइरम बन गया दामन-ए-कोह-सारगुल ओ नर्गिस ओ सोसन ओ नस्तरनशहीद-ए-अज़ल लाला-ख़ूनीं कफ़नजहाँ छुप गया पर्दा-ए-रंग मेंलहू की है गर्दिश रग-ए-संग मेंफ़ज़ा नीली नीली हवा में सुरूरठहरते नहीं आशियाँ में तुयूरवो जू-ए-कोहिस्ताँ उचकती हुईअटकती लचकती सरकती हुईउछलती फिसलती सँभलती हुईबड़े पेच खा कर निकलती हुईरुके जब तो सिल चीर देती है येपहाड़ों के दिल चीर देती है येज़रा देख ऐ साक़ी-ए-लाला-फ़ामसुनाती है ये ज़िंदगी का पयामपिला दे मुझे वो मय-ए-पर्दा-सोज़कि आती नहीं फ़स्ल-ए-गुल रोज़ रोज़वो मय जिस से रौशन ज़मीर-ए-हयातवो मय जिस से है मस्ती-ए-काएनातवो मय जिस में है सोज़-ओ-साज़-ए-अज़लवो मय जिस से खुलता है राज़-ए-अज़लउठा साक़िया पर्दा इस राज़ सेलड़ा दे ममूले को शहबाज़ सेज़माने के अंदाज़ बदले गएनया राग है साज़ बदले गएहुआ इस तरह फ़ाश राज़-ए-फ़रंगकि हैरत में है शीशा-बाज़-ए-फ़रंगपुरानी सियासत-गरी ख़्वार हैज़मीं मीर ओ सुल्ताँ से बे-ज़ार हैगया दौर-ए-सरमाया-दारी गयातमाशा दिखा कर मदारी गयागिराँ ख़्वाब चीनी सँभलने लगेहिमाला के चश्मे उबलने लगेदिल-ए-तूर-ए-सीना-ओ-फ़ारान दो-नीमतजल्ली का फिर मुंतज़िर है कलीममुसलमाँ है तौहीद में गरम-जोशमगर दिल अभी तक है ज़ुन्नार-पोशतमद्दुन तसव्वुफ़ शरीअत-ए-कलामबुतान-ए-अजम के पुजारी तमामहक़ीक़त ख़ुराफ़ात में खो गईये उम्मत रिवायात में खो गईलुभाता है दिल को कलाम-ए-ख़तीबमगर लज़्ज़त-ए-शौक़ से बे-नसीबबयाँ इस का मंतिक़ से सुलझा हुआलुग़त के बखेड़ों में उलझा हुआवो सूफ़ी कि था ख़िदमत-ए-हक़ में मर्दमोहब्बत में यकता हमीयत में फ़र्दअजम के ख़यालात में खो गयाये सालिक मक़ामात में खो गयाबुझी इश्क़ की आग अंधेर हैमुसलमाँ नहीं राख का ढेर हैशराब-ए-कुहन फिर पिला साक़ियावही जाम गर्दिश में ला साक़ियामुझे इश्क़ के पर लगा कर उड़ामिरी ख़ाक जुगनू बना कर उड़ाख़िरद को ग़ुलामी से आज़ाद करजवानों को पीरों का उस्ताद करहरी शाख़-ए-मिल्लत तिरे नम से हैनफ़स इस बदन में तिरे दम से हैतड़पने फड़कने की तौफ़ीक़ देदिल-ए-मुर्तज़ा सोज़-ए-सिद्दीक़ देजिगर से वही तीर फिर पार करतमन्ना को सीनों में बेदार करतिरे आसमानों के तारों की ख़ैरज़मीनों के शब ज़िंदा-दारों की ख़ैरजवानों को सोज़-ए-जिगर बख़्श देमिरा इश्क़ मेरी नज़र बख़्श देमिरी नाव गिर्दाब से पार करये साबित है तो इस को सय्यार करबता मुझ को असरार-ए-मर्ग-ओ-हयातकि तेरी निगाहों में है काएनातमिरे दीदा-ए-तर की बे-ख़्वाबियाँमिरे दिल की पोशीदा बेताबियाँमिरे नाला-ए-नीम-शब का नियाज़मिरी ख़ल्वत ओ अंजुमन का गुदाज़उमंगें मिरी आरज़ूएँ मिरीउम्मीदें मिरी जुस्तुजुएँ मिरीमिरी फ़ितरत आईना-ए-रोज़गारग़ज़ालान-ए-अफ़्कार का मुर्ग़-ज़ारमिरा दिल मिरी रज़्म-गाह-ए-हयातगुमानों के लश्कर यक़ीं का सबातयही कुछ है साक़ी मता-ए-फ़क़ीरइसी से फ़क़ीरी में हूँ मैं अमीरमिरे क़ाफ़िले में लुटा दे इसेलुटा दे ठिकाने लगा दे इसेदमा-दम रवाँ है यम-ए-ज़िंदगीहर इक शय से पैदा रम-ए-ज़िंदगीइसी से हुई है बदन की नुमूदकि शो'ले में पोशीदा है मौज-ए-दूदगिराँ गरचे है सोहबत-ए-आब-ओ-गिलख़ुश आई इसे मेहनत-ए-आब-ओ-गिलये साबित भी है और सय्यार भीअनासिर के फंदों से बे-ज़ार भीये वहदत है कसरत में हर दम असीरमगर हर कहीं बे-चुगों बे-नज़ीरये आलम ये बुत-ख़ाना-ए-शश-जिहातइसी ने तराशा है ये सोमनातपसंद इस को तकरार की ख़ू नहींकि तू मैं नहीं और मैं तू नहींमन ओ तू से है अंजुमन-आफ़रींमगर ऐन-ए-महफ़िल में ख़ल्वत-नशींचमक उस की बिजली में तारे में हैये चाँदी में सोने में पारे में हैउसी के बयाबाँ उसी के बबूलउसी के हैं काँटे उसी के हैं फूलकहीं उस की ताक़त से कोहसार चूरकहीं उस के फंदे में जिब्रील ओ हूरकहीं जज़ा है शाहीन सीमाब रंगलहू से चकोरों के आलूदा चंगकबूतर कहीं आशियाने से दूरफड़कता हुआ जाल में ना-सुबूरफ़रेब-ए-नज़र है सुकून ओ सबाततड़पता है हर ज़र्रा-ए-काएनातठहरता नहीं कारवान-ए-वजूदकि हर लहज़ है ताज़ा शान-ए-वजूदसमझता है तू राज़ है ज़िंदगीफ़क़त ज़ौक़-ए-परवाज़ है ज़िंदगीबहुत उस ने देखे हैं पस्त ओ बुलंदसफ़र उस को मंज़िल से बढ़ कर पसंदसफ़र ज़िंदगी के लिए बर्ग ओ साज़सफ़र है हक़ीक़त हज़र है मजाज़उलझ कर सुलझने में लज़्ज़त उसेतड़पने फड़कने में राहत उसेहुआ जब उसे सामना मौत काकठिन था बड़ा थामना मौत काउतर कर जहान-ए-मकाफ़ात मेंरही ज़िंदगी मौत की घात मेंमज़ाक़-ए-दुई से बनी ज़ौज ज़ौजउठी दश्त ओ कोहसार से फ़ौज फ़ौजगुल इस शाख़ से टूटते भी रहेइसी शाख़ से फूटते भी रहेसमझते हैं नादाँ उसे बे-सबातउभरता है मिट मिट के नक़्श-ए-हयातबड़ी तेज़ जौलाँ बड़ी ज़ूद-रसअज़ल से अबद तक रम-ए-यक-नफ़सज़माना कि ज़ंजीर-ए-अय्याम हैदमों के उलट-फेर का नाम हैये मौज-ए-नफ़स क्या है तलवार हैख़ुदी क्या है तलवार की धार हैख़ुदी क्या है राज़-दरून-हयातख़ुदी क्या है बेदारी-ए-काएनातख़ुदी जल्वा बदमस्त ओ ख़ल्वत-पसंदसमुंदर है इक बूँद पानी में बंदअँधेरे उजाले में है ताबनाकमन ओ तू में पैदा मन ओ तू से पाकअज़ल उस के पीछे अबद सामनेन हद उस के पीछे न हद सामनेज़माने के दरिया में बहती हुईसितम उस की मौजों के सहती हुईतजस्सुस की राहें बदलती हुईदमा-दम निगाहें बदलती हुईसुबुक उस के हाथों में संग-ए-गिराँपहाड़ उस की ज़र्बों से रेग-ए-रवाँसफ़र उस का अंजाम ओ आग़ाज़ हैयही उस की तक़्वीम का राज़ हैकिरन चाँद में है शरर संग मेंये बे-रंग है डूब कर रंग मेंइसे वास्ता क्या कम-ओ-बेश सेनशेब ओ फ़राज़ ओ पस-ओ-पेश सेअज़ल से है ये कशमकश में असीरहुई ख़ाक-ए-आदम में सूरत-पज़ीरख़ुदी का नशेमन तिरे दिल में हैफ़लक जिस तरह आँख के तिल में हैख़ुदी के निगहबाँ को है ज़हर-नाबवो नाँ जिस से जाती रहे उस की आबवही नाँ है उस के लिए अर्जुमंदरहे जिस से दुनिया में गर्दन बुलंदख़ुदी फ़ाल-ए-महमूद से दरगुज़रख़ुदी पर निगह रख अयाज़ी न करवही सज्दा है लाइक़-ए-एहतिमामकि हो जिस से हर सज्दा तुझ पर हरामये आलम ये हंगामा-ए-रंग-ओ-सौतये आलम कि है ज़ेर-ए-फ़रमान-ए-मौतये आलम ये बुत-ख़ाना-ए-चश्म-ओ-गोशजहाँ ज़िंदगी है फ़क़त ख़ुर्द ओ नोशख़ुदी की ये है मंज़िल-ए-अव्वलींमुसाफ़िर ये तेरा नशेमन नहींतिरी आग इस ख़ाक-दाँ से नहींजहाँ तुझ से है तू जहाँ से नहींबढ़े जा ये कोह-ए-गिराँ तोड़ करतिलिस्म-ए-ज़मान-ओ-मकाँ तोड़ करख़ुदी शेर-ए-मौला जहाँ उस का सैदज़मीं उस की सैद आसमाँ उस का सैदजहाँ और भी हैं अभी बे-नुमूदकि ख़ाली नहीं है ज़मीर-ए-वजूदहर इक मुंतज़िर तेरी यलग़ार कातिरी शौख़ी-ए-फ़िक्र-ओ-किरदार काये है मक़्सद गर्दिश-ए-रोज़गारकि तेरी ख़ुदी तुझ पे हो आश्कारतू है फ़ातह-ए-आलम-ए-ख़ूब-ओ-ज़िश्ततुझे क्या बताऊँ तिरी सरनविश्तहक़ीक़त पे है जामा-ए-हर्फ़-ए-तंगहक़ीक़त है आईना-ए-गुफ़्तार-ए-ज़ंगफ़रोज़ाँ है सीने में शम-ए-नफ़समगर ताब-ए-गुफ़्तार रखती है बसअगर यक-सर-ए-मू-ए-बरतर परमफ़रोग़-ए-तजल्ली ब-सोज़द परम
मैं जब भीज़िंदगी की चिलचिलाती धूप में तप करमैं जब भीदूसरों के और अपने झूट से थक करमैं सब से लड़ के ख़ुद से हार केजब भी उस एक कमरे में जाता थावो हल्के और गहरे कत्थई रंगों का इक कमरावो बेहद मेहरबाँ कमराजो अपनी नर्म मुट्ठी में मुझे ऐसे छुपा लेता थाजैसे कोई माँबच्चे को आँचल में छुपा लेप्यार से डाँटेये क्या आदत हैजलती दोपहर में मारे मारे घूमते हो तुमवो कमरा याद आता हैदबीज़ और ख़ासा भारीकुछ ज़रा मुश्किल से खुलने वाला वो शीशम का दरवाज़ाकि जैसे कोई अक्खड़ बापअपने खुरदुरे सीने मेंशफ़क़त के समुंदर को छुपाए होवो कुर्सीऔर उस के साथ वो जुड़वाँ बहन उस कीवो दोनोंदोस्त थीं मेरीवो इक गुस्ताख़ मुँह-फट आईनाजो दिल का अच्छा थावो बे-हँगम सी अलमारीजो कोने में खड़ीइक बूढ़ी अन्ना की तरहआईने को तंबीह करती थीवो इक गुल-दाननन्हा साबहुत शैतानउन दिनों पे हँसता थादरीचाया ज़ेहानत से भरी इक मुस्कुराहटऔर दरीचे पर झुकी वो बेलकोई सब्ज़ सरगोशीकिताबेंताक़ में और शेल्फ़ परसंजीदा उस्तानी बनी बैठींमगर सब मुंतज़िर इस बात कीमैं उन से कुछ पूछूँसिरहानेनींद का साथीथकन का चारा-गरवो नर्म-दिल तकियामैं जिस की गोद में सर रख केछत को देखता थाछत की कड़ियों मेंन जाने कितने अफ़्सानों की कड़ियाँ थींवो छोटी मेज़ परऔर सामने दीवार परआवेज़ां तस्वीरेंमुझे अपनाइयत से और यक़ीं से देखती थींमुस्कुराती थींउन्हें शक भी नहीं थाएक दिनमैं उन को ऐसे छोड़ जाऊँगामैं इक दिन यूँ भी जाऊँगाकि फिर वापस न आऊँगा
शा'इरसाहिल-ए-दरिया पे मैं इक रात था महव-ए-नज़रगोशा-ए-दिल में छुपाए इक जहान-ए-इज़तिराबशब सुकूत-अफ़्ज़ा हवा आसूदा दरिया नर्म सैरथी नज़र हैराँ कि ये दरिया है या तस्वीर-ए-आबजैसे गहवारे में सो जाता है तिफ़्ल-ए-शीर-ख़्वारमौज-ए-मुज़्तर थी कहीं गहराइयों में मस्त-ए-ख़्वाबरात के अफ़्सूँ से ताइर आशियानों में असीरअंजुम-ए-कम-ज़ौ गिरफ़्तार-ए-तिलिस्म-ए-माहताबदेखता क्या हूँ कि वो पैक-ए-जहाँ-पैमा ख़िज़्रजिस की पीरी में है मानिंद-ए-सहर रंग-ए-शबाबकह रहा है मुझ से ऐ जूया-ए-असरार-ए-अज़लचश्म-ए-दिल वा हो तो है तक़्दीर-ए-आलम बे-हिजाबदिल में ये सुन कर बपा हंगामा-ए-मशहर हुआमैं शहीद-ए-जुस्तुजू था यूँ सुख़न-गुस्तर हुआऐ तिरी चश्म-ए-जहाँ-बीं पर वो तूफ़ाँ आश्कारजिन के हंगामे अभी दरिया में सोते हैं ख़मोशकश्ती-ए-मिस्कीन-ओ-जान-ए-पाक-ओ-दीवार-ए-यतीमइल्म-ए-मूसा भी है तिरे सामने हैरत-फ़रोशछोड़ कर आबादियाँ रहता है तू सहरा-नवर्दज़िंदगी तेरी है बे-रोज़-ओ-शब-ओ-फ़र्दा-ओ-दोशज़िंदगी का राज़ क्या है सल्तनत क्या चीज़ हैऔर ये सरमाया-ओ-मेहनत में है कैसा ख़रोशहो रहा है एशिया का ख़िरक़ा-ए-देरीना चाकनौजवाँ अक़्वाम-ए-नौ-दौलत के हैं पैराया-पोशगरचे अस्कंदर रहा महरूम-ए-आब-ए-ज़िंदगीफितरत-ए-अस्कंदरी अब तक है गर्म-ए-नाओ-नोशबेचता है हाशमी नामूस दीन-ए-मुस्तफ़ाख़ाक-ओ-ख़ूँ में मिल रहा है तुर्कमान-ए-सख़्त-कोशआग है औलाद-ए-इब्राहीम है नमरूद हैक्या किसी को फिर किसी का इम्तिहाँ मक़्सूद हैजवाब-ए-ख़िज़रसहरा-नवर्दी
नहीं मिन्नत-कश-ए-ताब-ए-शुनीदन दास्ताँ मेरीख़मोशी गुफ़्तुगू है बे-ज़बानी है ज़बाँ मेरीये दस्तूर-ए-ज़बाँ-बंदी है कैसा तेरी महफ़िल मेंयहाँ तो बात करने को तरसती है ज़बाँ मेरीउठाए कुछ वरक़ लाले ने कुछ नर्गिस ने कुछ गुल नेचमन में हर तरफ़ बिखरी हुई है दास्ताँ मेरीउड़ा ली क़ुमरियों ने तूतियों ने अंदलीबों नेचमन वालों ने मिल कर लूट ली तर्ज़-ए-फ़ुग़ाँ मेरीटपक ऐ शम्अ आँसू बन के परवाने की आँखों सेसरापा दर्द हूँ हसरत भरी है दास्ताँ मेरीइलाही फिर मज़ा क्या है यहाँ दुनिया में रहने काहयात-ए-जावेदाँ मेरी न मर्ग-ए-ना-गहाँ मेरीमिरा रोना नहीं रोना है ये सारे गुलिस्ताँ कावो गुल हूँ मैं ख़िज़ाँ हर गुल की है गोया ख़िज़ाँ मेरीदरीं हसरत सरा उमरीस्त अफ़्सून-ए-जरस दारमज़ फ़ैज़-ए-दिल तपीदन-हा ख़रोश-ए-बे-नफ़स दारमरियाज़-ए-दहर में ना-आश्ना-ए-बज़्म-ए-इशरत हूँख़ुशी रोती है जिस को मैं वो महरूम-ए-मसर्रत हूँमिरी बिगड़ी हुई तक़दीर को रोती है गोयाईमैं हर्फ़-ए-ज़ेर-ए-लब शर्मिंदा-ए-गोश-ए-समाअत हूँपरेशाँ हूँ मैं मुश्त-ए-ख़ाक लेकिन कुछ नहीं खुलतासिकंदर हूँ कि आईना हूँ या गर्द-ए-कुदूरत हूँये सब कुछ है मगर हस्ती मिरी मक़्सद है क़ुदरत कासरापा नूर हो जिस की हक़ीक़त मैं वो ज़ुल्मत हूँख़ज़ीना हूँ छुपाया मुझ को मुश्त-ए-ख़ाक-ए-सहरा नेकिसी को क्या ख़बर है मैं कहाँ हूँ किस की दौलत हूँनज़र मेरी नहीं ममनून-ए-सैर-ए-अरसा-ए-हस्तीमैं वो छोटी सी दुनिया हूँ कि आप अपनी विलायत हूँन सहबा हूँ न साक़ी हूँ न मस्ती हूँ न पैमानामैं इस मय-ख़ाना-ए-हस्ती में हर शय की हक़ीक़त हूँमुझे राज़-ए-दो-आलम दिल का आईना दिखाता हैवही कहता हूँ जो कुछ सामने आँखों के आता हैअता ऐसा बयाँ मुझ को हुआ रंगीं-बयानों मेंकि बाम-ए-अर्श के ताइर हैं मेरे हम-ज़बानों मेंअसर ये भी है इक मेरे जुनून-ए-फ़ित्ना-सामाँ कामिरा आईना-ए-दिल है क़ज़ा के राज़-दानों मेंरुलाता है तिरा नज़्ज़ारा ऐ हिन्दोस्ताँ मुझ कोकि इबरत-ख़ेज़ है तेरा फ़साना सब फ़सानों मेंदिया रोना मुझे ऐसा कि सब कुछ दे दिया गोयालिखा कल्क-ए-अज़ल ने मुझ को तेरे नौहा-ख़्वानों मेंनिशान-ए-बर्ग-ए-गुल तक भी न छोड़ उस बाग़ में गुलचींतिरी क़िस्मत से रज़्म-आराइयाँ हैं बाग़बानों मेंछुपा कर आस्तीं में बिजलियाँ रक्खी हैं गर्दूं नेअनादिल बाग़ के ग़ाफ़िल न बैठें आशियानों मेंसुन ऐ ग़ाफ़िल सदा मेरी ये ऐसी चीज़ है जिस कोवज़ीफ़ा जान कर पढ़ते हैं ताइर बोस्तानों मेंवतन की फ़िक्र कर नादाँ मुसीबत आने वाली हैतिरी बर्बादियों के मशवरे हैं आसमानों मेंज़रा देख उस को जो कुछ हो रहा है होने वाला हैधरा क्या है भला अहद-ए-कुहन की दास्तानों मेंये ख़ामोशी कहाँ तक लज़्ज़त-ए-फ़रियाद पैदा करज़मीं पर तू हो और तेरी सदा हो आसमानों मेंन समझोगे तो मिट जाओगे ऐ हिन्दोस्ताँ वालोतुम्हारी दास्ताँ तक भी न होगी दास्तानों मेंयही आईन-ए-क़ुदरत है यही उस्लूब-ए-फ़ितरत हैजो है राह-ए-अमल में गामज़न महबूब-ए-फ़ितरत हैहुवैदा आज अपने ज़ख़्म-ए-पिन्हाँ कर के छोड़ूँगालहू रो रो के महफ़िल को गुलिस्ताँ कर के छोड़ूँगाजलाना है मुझे हर शम-ए-दिल को सोज़-ए-पिन्हाँ सेतिरी तारीक रातों में चराग़ाँ कर के छोड़ूँगामगर ग़ुंचों की सूरत हूँ दिल-ए-दर्द-आश्ना पैदाचमन में मुश्त-ए-ख़ाक अपनी परेशाँ कर के छोड़ूँगापिरोना एक ही तस्बीह में इन बिखरे दानों कोजो मुश्किल है तो इस मुश्किल को आसाँ कर के छोड़ूँगामुझे ऐ हम-नशीं रहने दे शग़्ल-ए-सीना-कावी मेंकि मैं दाग़-ए-मोहब्बत को नुमायाँ कर के छोड़ूँगादिखा दूँगा जहाँ को जो मिरी आँखों ने देखा हैतुझे भी सूरत-ए-आईना हैराँ कर के छोड़ूँगाजो है पर्दों में पिन्हाँ चश्म-ए-बीना देख लेती हैज़माने की तबीअत का तक़ाज़ा देख लेती हैकिया रिफ़अत की लज़्ज़त से न दिल को आश्ना तू नेगुज़ारी उम्र पस्ती में मिसाल-ए-नक़्श-ए-पा तू नेरहा दिल-बस्ता-ए-महफ़िल मगर अपनी निगाहों कोकिया बैरून-ए-महफ़िल से न हैरत-आश्ना तू नेफ़िदा करता रहा दिल को हसीनों की अदाओं परमगर देखी न उस आईने में अपनी अदा तू नेतअस्सुब छोड़ नादाँ दहर के आईना-ख़ाने मेंये तस्वीरें हैं तेरी जिन को समझा है बुरा तू नेसरापा नाला-ए-बेदाद-ए-सोज़-ए-ज़िंदगी हो जासपंद-आसा गिरह में बाँध रक्खी है सदा तू नेसफ़ा-ए-दिल को क्या आराइश-ए-रंग-ए-तअल्लुक़ सेकफ़-ए-आईना पर बाँधी है ओ नादाँ हिना तू नेज़मीं क्या आसमाँ भी तेरी कज-बीनी पे रोता हैग़ज़ब है सत्र-ए-क़ुरआन को चलेपा कर दिया तू नेज़बाँ से गर किया तौहीद का दावा तो क्या हासिलबनाया है बुत-ए-पिंदार को अपना ख़ुदा तू नेकुएँ में तू ने यूसुफ़ को जो देखा भी तो क्या देखाअरे ग़ाफ़िल जो मुतलक़ था मुक़य्यद कर दिया तू नेहवस बाला-ए-मिम्बर है तुझे रंगीं-बयानी कीनसीहत भी तिरी सूरत है इक अफ़्साना-ख़्वानी कीदिखा वो हुस्न-ए-आलम-सोज़ अपनी चश्म-ए-पुर-नम कोजो तड़पाता है परवाने को रुलवाता है शबनम कोज़रा नज़्ज़ारा ही ऐ बुल-हवस मक़्सद नहीं उस काबनाया है किसी ने कुछ समझ कर चश्म-ए-आदम कोअगर देखा भी उस ने सारे आलम को तो क्या देखानज़र आई न कुछ अपनी हक़ीक़त जाम से जम कोशजर है फ़िरक़ा-आराई तअस्सुब है समर उस काये वो फल है कि जन्नत से निकलवाता है आदम कोन उट्ठा जज़्बा-ए-ख़ुर्शीद से इक बर्ग-ए-गुल तक भीये रिफ़अत की तमन्ना है कि ले उड़ती है शबनम कोफिरा करते नहीं मजरूह-ए-उल्फ़त फ़िक्र-ए-दरमाँ मेंये ज़ख़्मी आप कर लेते हैं पैदा अपने मरहम कोमोहब्बत के शरर से दिल सरापा नूर होता हैज़रा से बीज से पैदा रियाज़-ए-तूर होता हैदवा हर दुख की है मजरूह-ए-तेग़-ए-आरज़ू रहनाइलाज-ए-ज़ख़्म है आज़ाद-ए-एहसान-ए-रफ़ू रहनाशराब-ए-बे-ख़ुदी से ता-फ़लक परवाज़ है मेरीशिकस्त-ए-रंग से सीखा है मैं ने बन के बू रहनाथमे क्या दीदा-ए-गिर्यां वतन की नौहा-ख़्वानी मेंइबादत चश्म-ए-शाइर की है हर दम बा-वज़ू रहनाबनाएँ क्या समझ कर शाख़-ए-गुल पर आशियाँ अपनाचमन में आह क्या रहना जो हो बे-आबरू रहनाजो तू समझे तो आज़ादी है पोशीदा मोहब्बत मेंग़ुलामी है असीर-ए-इम्तियाज़-ए-मा-ओ-तू रहनाये इस्तिग़्ना है पानी में निगूँ रखता है साग़र कोतुझे भी चाहिए मिस्ल-ए-हबाब-ए-आबजू रहनान रह अपनों से बे-परवा इसी में ख़ैर है तेरीअगर मंज़ूर है दुनिया में ओ बेगाना-ख़ू रहनाशराब-ए-रूह-परवर है मोहब्बत नौ-ए-इंसाँ कीसिखाया इस ने मुझ को मस्त बे-जाम-ओ-सुबू रहनामोहब्बत ही से पाई है शिफ़ा बीमार क़ौमों नेकिया है अपने बख़्त-ए-ख़ुफ़्ता को बेदार क़ौमों नेबयाबान-ए-मोहब्बत दश्त-ए-ग़ुर्बत भी वतन भी हैये वीराना क़फ़स भी आशियाना भी चमन भी हैमोहब्बत ही वो मंज़िल है कि मंज़िल भी है सहरा भीजरस भी कारवाँ भी राहबर भी राहज़न भी हैमरज़ कहते हैं सब इस को ये है लेकिन मरज़ ऐसाछुपा जिस में इलाज-ए-गर्दिश-ए-चर्ख़-ए-कुहन भी हैजलाना दिल का है गोया सरापा नूर हो जानाये परवाना जो सोज़ाँ हो तो शम-ए-अंजुमन भी हैवही इक हुस्न है लेकिन नज़र आता है हर शय मेंये शीरीं भी है गोया बे-सुतूँ भी कोहकन भी हैउजाड़ा है तमीज़-ए-मिल्लत-ओ-आईं ने क़ौमों कोमिरे अहल-ए-वतन के दिल में कुछ फ़िक्र-ए-वतन भी हैसुकूत-आमोज़ तूल-ए-दास्तान-ए-दर्द है वर्नाज़बाँ भी है हमारे मुँह में और ताब-ए-सुख़न भी हैनमी-गर्दीद को तह रिश्ता-ए-मअ'नी रिहा कर्दमहिकायत बूद बे-पायाँ ब-ख़ामोशी अदा कर्दम
जब दरख़्त ख़ामोश थेऔर बादल शोर कर रहे थेमैं तुम्हें याद कर रहा थाजब औरतें आग रौशन कर रही थींमैं तुम्हें याद कर रहा थाजब मैदान से एक बच्चे का जनाज़ा गुज़र रहा थामैं तुम्हें याद कर रहा थाजब क़ैदियों की गाड़ी अदालत के सामने खड़ी थीमैं तुम्हें याद कर रहा थाजब लोग इबादत-गाहों की तरफ़ जा रहे थेमैं तुम्हें याद कर रहा थाजब दुनिया में हर शख़्स के पास एक न एक काम थामैं तुम्हें याद कर रहा था
बल्ली-मारां के मोहल्ले की वो पेचीदा दलीलों की सी गलियाँसामने टाल की नुक्कड़ पे बटेरों के क़सीदेगुड़गुड़ाती हुई पान की पीकों में वो दाद वो वाह वाचंद दरवाज़ों पे लटके हुए बोसीदा से कुछ टाट के पर्देएक बकरी के मिम्याने की आवाज़और धुँदलाई हुई शाम के बे-नूर अँधेरे साएऐसे दीवारों से मुँह जोड़ के चलते हैं यहाँचूड़ी-वालान कै कटरे की बड़ी-बी जैसेअपनी बुझती हुई आँखों से दरवाज़े टटोले
ख़ुदा-ए-इज़्ज़-ओ-जल की नेमतों का मो'तरिफ़ हूँ मैंमुझे इक़रार है उस ने ज़मीं को ऐसे फैलायाकि जैसे बिस्तर-ए-कम-ख़्वाब हो दीबा-ओ-मख़मल होमुझे इक़रार है ये ख़ेमा-ए-अफ़्लाक का सायाउसी की बख़्शिशें हैं उस ने सूरज चाँद तारों कोफ़ज़ाओं में सँवारा इक हद-ए-फ़ासिल मुक़र्रर कीचटानें चीर कर दरिया निकाले ख़ाक-ए-असफ़ल सेमिरी तख़्लीक़ की मुझ को जहाँ की पासबानी दीसमुंदर मोतियों मूँगों से कानें लाल-ओ-गौहर सेहवाएँ मस्त-कुन ख़ुशबुओं से मामूर कर दी हैंवो हाकिम क़ादिर-ए-मुतलक़ है यकता और दाना हैअँधेरे को उजाले से जुदा करता है ख़ुद को मैंअगर पहचानता हूँ उस की रहमत और सख़ावत हैउसी ने ख़ुसरवी दी है लईमों को मुझे नक्बतउसी ने यावा-गोयों को मिरा ख़ाज़िन बनाया हैतवंगर हिर्ज़ा-कारों को किया दरयूज़ा-गर मुझ कोमगर जब जब किसी के सामने दामन पसारा हैये लड़का पूछता है अख़्तर-उल-ईमान तुम ही हो
सोचता हूँ कि मोहब्बत है जवानी की ख़िज़ाँउस ने देखा नहीं दुनिया में बहारों के सिवानिकहत-ओ-नूर से लबरेज़ नज़ारों के सिवासब्ज़ा-ज़ारों के सिवा और सितारों के सिवासोचता हूँ कि ग़म-ए-दिल न सुनाऊँ उस कोसामने उस के कभी राज़ को उर्यां न करूँख़लिश-ए-दिल से उसे दस्त-ओ-गरेबाँ न करूँउस के जज़्बात को मैं शो'ला-ब-दामाँ न करूँसोचता हूँ कि जला देगी मोहब्बत उस कोवो मोहब्बत की भला ताब कहाँ लाएगीख़ुद तो वो आतिश-ए-जज़्बात में जल जाएगीऔर दुनिया को इस अंजाम पे तड़पाएगीसोचता हूँ कि बहुत सादा-ओ-मासूम है वोमैं उसे वाक़िफ़-ए-उल्फ़त न करूँ
बैठा है मेरे सामने वोजाने किसी सोच में पड़ा हैअच्छी आँखें मिली हैं उस कोवहशत करना भी आ गया हैबिछ जाऊँ मैं उस के रास्ते मेंफिर भी क्या इस से फ़ाएदा हैहम दोनों ही ये तो जानते हैंवो मेरे लिए नहीं बना हैमेरे लिए उस के हाथ काफ़ीउस के लिए सारा फ़ल्सफ़ा हैमेरी नज़रों से है परेशाँख़ुद अपनी कशिश से ही ख़फ़ा हैसब बात समझ रहा है लेकिनगुम-सुम सा मुझ को देखता हैजैसे मेले में कोई बच्चाअपनी माँ से बिछड़ गया हैउस के सीने में छुप के रोऊँमेरा दिल तो ये चाहता हैकैसा ख़ुश-रंग फूल है वोजो उस के लबों पे खिल रहा हैया रब वो मुझे कभी न भूलेमेरी तुझ से यही दुआ है
रेत से बुत न बना ऐ मिरे अच्छे फ़नकारएक लम्हे को ठहर मैं तुझे पत्थर ला दूँमैं तिरे सामने अम्बार लगा दूँ लेकिनकौन से रंग का पत्थर तिरे काम आएगासुर्ख़ पत्थर जिसे दिल कहती है बे-दिल दुनियाया वो पथराई हुई आँख का नीला पत्थरजिस में सदियों के तहय्युर के पड़े हों डोरेक्या तुझे रूह के पत्थर की ज़रूरत होगीजिस पे हक़ बात भी पत्थर की तरह गिरती हैइक वो पत्थर है जो कहलाता है तहज़ीब-ए-सफ़ेदउस के मरमर में सियह ख़ून झलक जाता हैएक इंसाफ़ का पत्थर भी तो होता है मगरहाथ में तेशा-ए-ज़र हो तो वो हाथ आता हैजितने मेयार हैं इस दौर के सब पत्थर हैंजितनी अक़दार हैं इस दौर की सब पत्थर हैंसब्ज़ा ओ गुल भी हवा और फ़ज़ा भी पत्थरमेरा इल्हाम तिरा ज़ेहन-ए-रसा भी पत्थरइस ज़माने में तो हर फ़न का निशाँ पत्थर हैहाथ पत्थर हैं तिरे मेरी ज़बाँ पत्थर हैरेत से बुत न बना ऐ मिरे अच्छे फ़नकार
आज मोहब्बत का जन्म-दिन हैआज हम उदासी की छुरी सेअपने दिल को काटेंगेआज हम अपनी पलकों परजलती हुई मोम-बत्ती रख केएक तार पर से गुज़़रेंगेहमें कोई नहीं देखेगामगर हम हर बंद खिड़की की तरफ़देखेंगेहर दरवाज़े के सामने फूल रखेंगेकिसी न किसी बात परहम रोएँगे और अपने रोने परहम हँसेंगेआज मोहब्बत का जन्म-दिन हैआज हम हर दरख़्त के सामने सेगुज़रते हुएटोपी उतार कर उसे सलाम करेंगेहर बादल को देख केहाथ हिलाएँगेहर सितारे का शुक्रिया अदा करेंगेहमारे आँसुओं नेहमारे हथेलियों को छलनी कर दिया हैआज हम अपने दोनों हाथजेबों में डाल कर चलेंगेऔर अगले बरस तक चलते रहेंगे
ऐ जहाँ-ज़ाद,नशात उस शब-ए-बे-राह-रवी कीमैं कहाँ तक भूलूँ?ज़ोर-ए-मय था कि मेरे हाथ की लर्ज़िश थीकि उस रात कोई जाम गिरा टूट गयातुझे हैरत न हुई!कि तिरे घर के दरीचों के कई शीशों परउस से पहले की भी दुर्ज़ें थीं बहुततुझे हैरत न हुई!ऐ जहाँ-ज़ाद,मैं कूज़ों की तरफ़ अपने तग़ारों की तरफ़अब जो बग़दाद से लौटा हूँतो मैं सोचता हूँसोचता हूँ तू मेरे सामने आईना रहीसर-ए-बाज़ार दरीचे में सर-ए-बिस्तर-ए-संजाब कभीतू मेरे सामने आईना रहीजिस में कुछ भी नज़र आया न मुझेअपनी ही सूरत के सिवाअपनी तन्हाई-ए-जाँ-काह की दहशत के सिवा!लिख रहा हूँ तुझे ख़तऔर वो आईना मेरे हाथ में हैइस में कुछ भी नज़र आता नहींअब एक ही सूरत के सिवा!लिख रहा हूँ तुझे ख़तऔर मुझे लिखना भी कहाँ आता है?लौह-ए-आईना पे अश्कों की फव्वारों ही सेख़त क्यूँ न लिखूँ?ऐ जहाँ-ज़ाद,नशात उस शब-ए-बे-राह-रवी कीमुझे फिर लाएगी?वक़्त क्या चीज़ है तू जानती है?वक़्त इक ऐसा पतिंगा हैजो दीवारों पे आईनों पेपैमानों पे शीशों पेमिरे जाम ओ सुबू मेरे तग़ारों पेसदा रेंगता है
दुनिया के रंग अनोखे हैंजो मेरे सामने रहता है उस के घर में घर-वाली हैऔर दाएँ पहलू में इक मंज़िल का है मकाँ वो ख़ाली हैऔर बाएँ जानिब इक अय्याश है जिस के हाँ इक दाश्ता हैऔर इन सब में इक मैं भी हूँ लेकिन बस तू ही नहींहैं और तो सब आराम मुझे इक गेसुओं की ख़ुशबू ही नहींफ़ारिग़ होता हूँ नाश्ते से और अपने घर से निकलता हूँदफ़्तर की राह पर चलता हूँरस्ते में शहर की रौनक़ है इक ताँगा है दो कारें हैंबच्चे मकतब को जाते हैं और तांगों की क्या बात कहूँकारें तो छिछलती बिजली हैं तांगों के तीरों को कैसे सहूँये माना इन में शरीफ़ों के घर की धन-दौलत है माया हैकुछ शोख़ भी हैं मासूम भी हैंलेकिन रस्ते पर पैदल मुझ से बद-क़िस्मत मग़्मूम भी हैंतांगों पर बर्क़-ए-तबस्सुम हैबातों का मीठा तरन्नुम हैउकसाता है ध्यान ये रह रह कर क़ुदरत के दिल में तरह्हुम हैहर चीज़ तो है मौजूद यहाँ इक तू ही नहीं इक तू ही नहींऔर मेरी आँखों में रोने की हिम्मत ही नहीं आँसू ही नहीं
ज़हे-क़िस्मत हिलाल-ए-ईद की सूरत नज़र आईजो थे रमज़ान के बीमार उन सब ने शिफ़ा पाईपहाड़ों से वो उतरे क़ाफ़िले रोज़ा-गुज़ारूँ केगया गरमी का 'मौसम और आए दिन बहारों केउठा होटल का 'पर्दा सामने पर्दा-नशीं आएजो छुप कर कर रहे थे एहतिराम-ए-हुक्म-ए-दीं आएहुई अँगूर की बेटी से ''मस्ती-ख़ान'' की शादीखुले दर मय-कदों के और मिली रिंदों को आज़ादीनवेद-ए-कामरानी ला रहे हैं रेस के घोड़ेमसर्रत के तराने गा रहे हैं रेस के घोड़ेमुबारक हो कि फिर से हो गया ''डांस'' और ''डिनर'' चालूख़लास अहल-ए-नज़र होंगे हुआ दर्द-ए-जिगर चालूनमाज़-ए-ईद पढ़ने के लिए सरकार आए हैंऔर उन के साथ सारे तालिब-ए-दीदार आए हैंयही दिन अहल-ए-दिल के वास्ते उम्मीद का दिन हैतुम्हारी दीद का दिन है हमारी ईद का दिन है
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