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नज़्म
शिद्दत-ए-कर्ब में डूबी हुई मेरी गुफ़्तार
मैं कि ख़ुद अपने मज़ाक़-ए-तरब-आगीं का शिकार
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
इस को करूँ शिकार जो मुझ को दे दो दाँत उधार
अच्छी मुन्नी तुम ने अपने इतने दाँत गँवाए
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
कभी फ़रेब-ए-ख़याल बन कर कभी कभी भूल कर शुऊर-ए-जमाल बन कर
शिकार की ना-तवाँ नज़र को सुझा रहा है
मीराजी
नज़्म
मर्द-ओ-ज़न पीर-ओ-जवाँ इन के मज़ालिम के शिकार
ख़ून-ए-मासूम में डूबी हुई इन की तलवार
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
खोल आँखें देख अपने मुस्लिमों का हाल-ए-ज़ार
उन को तो उन काफ़िर यहूदों ने बनाया है शिकार
शहज़ादी कुलसूम
नज़्म
माह-पारों का हदफ़ ज़ोहरा-जबीनों का शिकार
नग़्मा-पैरा ओ नवासंज ओ ग़ज़ल-ख़्वाँ हूँ मैं
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
घात में तेरी रहा ये ख़ुद-ग़रज़ सरमाया-दार
खेलता है जो बराबर नौ-ए-इंसाँ का शिकार