आह-ए-बेकस

प्रेमचंद

आह-ए-बेकस

प्रेमचंद

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    स्टोरीलाइन

    अपनी ईमानदारी, मेहनत और क़ानून-दानी के लिए मशहूर मुंशी सेवक राम के पास लोग अपनी अमानत रखा करते थे। मगर हक़ीक़त से पर्दा तब उठना शुरू हुआ जब बेवा मूंगा ब्राह्मनी ने मुंशी जी के पास कुछ रुपये अमानत रखे, जिन्हें बाद में मुंशी जी ने देने से मना कर दिया। इससे मूंगा पागल हो गई और एक आह के साथ उसने मुंशी के दरवाजे़ पर दम तोड़ दिया। मूंगा की इस आह का ऐसा असर हुआ कि मुंशी का पूरा ख़ानदान ही तबाह हो गया।

    मुंशी राम सेवक भवें चढ़ाए हुए घर से निकले और बोले, ऐसी ज़िंदगी से तो मौत बेहतर।

    मौत की दस्त दराज़ियों का सारा ज़माना शाकी है। अगर इन्सान का बस चलता तो मौत का वुजूद ही रहता, मगर फ़िलवाक़े मौत को जितनी दावतें दी जाती हैं उन्हें क़ुबूल करने की फ़ुर्सत ही नहीं। अगर उसे इतनी फ़ुर्सत होती तो आज ज़माना वीरान नज़र आता।

    मुंशी राम सेवक मौज़ा चांद-पुर के एक मुमताज़ रईस थे और रुअसा के औसाफ़-ए-हमीदा से बहरावर वसीला मआश इतना ही वसीअ था जितनी इन्सान की हिमाक़तें और कमज़ोरियाँ यही उनकी इमलाक और मौरूसी जायदाद थी। वो रोज़ अदालत मुंसफ़ी के अहाते में नीम के दरख़्त के नीचे काग़ज़ात का बस्ता खोले एक शिकस्ता हाल चौकी पर बैठे नज़र आते थे और गो उन्हें किसी ने इजलास में क़ानूनी बहस या मुक़द्दमे की पैरवी करते नहीं देखा, मगर उर्फ़-ए-आम में वो मुख़्तार साहब मशहूर थे। तूफ़ान आए, पानी बरसे, ओले गिरें। मगर मुख़्तार साहब किसी नामुराद दिल की तरह वहीं जमे रहते थे। वो कचहरी चलते थे तो दहक़ानियों का एक जुलूस सा नज़र आता। चारों तरफ़ से उन पर अक़ीदत एहतराम की निगाहें पड़तीं और अतराफ़ में मशहूर था कि उनकी ज़बान पर सरस्वती हैं।

    उसे वकालत कहो या मुख़्तार कारी मगर ये सिर्फ़ ख़ानदानी या एज़ाज़ी पेशा था। आमदनी की सूरतें यहां मफ़क़ूद थीं। नुक़रई सिक्कों का तो ज़िक्र ही क्या कभी कभी मिसी सिक्के भी आज़ादी से आने में तअम्मुल करते थे।

    मुंशी जी की क़ानूनदानी में भी कोई शक नहीं मगर पास की मनहूस क़ैद ने उन्हें मजबूर कर दिया था। बहरहाल जो कुछ हो ये महज़ एज़ाज़ के लिए था वर्ना उनकी गुज़र उनकी ख़ास सूरत, क़ुर्ब-ओ-जवार की बेकस मगर फ़ारिगुलबाल बेवाओं और सादा-लौह मगर ख़ुशहाल बुड्ढों की ख़ुश मुआमलगी थी। बेवाऐं अपना रुपया उनकी अमानत में रखतीं, बूढ़े अपनी पूँजी ना ख़ल्फ़ लड़कों की दस्त बुरद से महफ़ूज़ रखने के लिए उन्हें सौंपते और रुपया एक दफ़ा उनकी मुट्ठी में जाकर निकलना नहीं जानता था। वो हस्ब-ए-ज़रूरत कभी कभी क़र्ज़ भी लेते थे। बिला क़र्ज़ लिए किस का काम चल सकता है। सुब्ह को शाम के वादे पर लेते मगर वो शाम कभी नहीं आती थी। ख़ुलासा ये कि मुंशी जी क़र्ज़ लेकर देना नहीं जानते थे। और उनका ख़ानदानी वस्फ़ था, इस ख़ानदान की ये रस्म क़दीम थी।

    ये मुआमलात अक्सर मुंशी जी के आराम में मुख़िल हुआ करते थे। क़ानून और अदालत का तो उन्हें कोई ख़ौफ़ था। इस मैदान में उनका सामना करना पानी में रह कर मगर से बैर करना था। लेकिन जब बा'ज़ शरीर-उल-नफ़्स लोग ख़्वाह-मख़्वाह उनसे बदज़न हो जाते उनकी ख़ुशनियती पर शक करते और उनके रूबरू ऐलानिया बद ज़बानियों पर उतर आते तो मुंशी जी को बड़ा सदमा होता। इस क़िस्म के नाख़ुशगवार वाक़ियात आए दिन होते रहते थे। हर जगह ऐसे तंग-ज़र्फ़ हज़रात मौजूद रहते हैं जिन्हें दूसरों की तहक़ीर में मज़ा आता है। उन्हीं बद ख़्वाहों की शह पाकर बा’ज़ औक़ात छोटे छोटे आदमी मुंशी जी के मुँह आजाते। वर्ना एक कुँजड़िन का इतना हौसला हो सकता था कि उनके घर में जाकर उन्हीं की शान में नाज़ेबा कलमात मुँह से निकाले। मुंशी जी उसके पुराने गाहक थे, बरसों तक उससे सब्ज़ी ली थी अगर दाम दिए तो कुँजड़िन को सब्र करना चाहिए था जल्द या देर में मिल ही जाते, मगर वो बद-ज़ुबान औरत दो साल ही में घबरा गई और चंद आने पैसों के लिए एक मुअज़्ज़ज़ आदमी की जान-रेज़ी की। ऐसी हालत में आकर झुँझला कर मौत को दावत दी तो उनकी कोई ख़ता नहीं।

    इस मौज़े में मूंगा नाम की एक बेवा ब्रहमनी थी। उसका शौहर बर्मा की काली पलटन में हवलदार था, वो वहीं मारा गया। उसके हुस्न-ए-ख़िदमात के सिले में मूंगा को पाँच सौ रुपये मिले थे। बेवा औरत थी ज़माना नाज़ुक उसने ये रुपये मुंशी राम सेवक को सौंप दिए और हर माह उसमें से थोड़ा थोड़ा लेकर गुज़र करती रही। मुंशी जी ने ये फ़र्ज़ कई साल तक नेकनियती से पूरा किया मगर जब पीराना-साली के बावजूद मूंगा ने मरने में ताम्मुल किया और मुंशी जी को अंदेशा हुआ शायद वो तोशा-ए-आख़िरत... के लिए निस्फ़ रक़्म भी छोड़ना नहीं चाहती तो एक रोज़ उन्होंने कहा, मूंगा तुम्हें मरना है या नहीं। साफ़ साफ़ कह दो ताकि मैं अपने मरने की फ़िक्र करूँ।

    उस दिन मूंगा की आँखें खुलीं ख़्वाब से बेदार हुई बोली, मेरा हिसाब कर दो। फ़र्द-ए-हिसाब तैयार थी अमानत में अब एक कौड़ी भी थी इस सख़्तगिरी से जो बुढ़ापे के साथ मख़सूस है, उसने मुंशी जी का हाथ पकड़ लिया और कहा, मेरे सौ रुपये तुमने दबाए हैं, मैं एक एक कौड़ी ले लूँगी।

    मगर बेकसों का गु़स्सा पटाख़े की आवाज़ है। जिससे बच्चे डर जाते हैं और असर कुछ नहीं होता।

    अदालत में उसका कुछ ज़ोर था। कोई लिखापढ़ी हिसाब किताब, अलबत्ता पंचायत से कुछ उम्मीद थी और पंचायत बैठी। गांव के आदमी जमा हुए। मुंशी जी नीयत और मुआमले के साफ़ थे। उन्हें पंचों का क्या ख़ौफ़। सभा में खड़े हो कर पंचों से कहा,

    भाइयो, आप सब लोग ईमानदार और शरीफ़ हैं, मैं आप साहिबों का ख़ाक-ए-पा और परवर्दा हूँ, आप सभों की इनायात अलताफ़ से फ़ैज़ करम से मुहब्बत शफ़क़त से मेरा हर एक रोंगटा गिराँबार है। क्या आप सब नेक और शरीफ़ हज़रात ख़याल करते हैं कि मैंने एक बेकस और बेवा औरत के रुपये हज़म कर लिए।

    पंचों ने एक ज़बान कहा, नहीं आपसे ऐसा नहीं हो सकता।

    अगर आप सब नेक और शरीफ़ साहिबान का ख़याल है कि मैंने रुपये दबा लिये तो मेरे डूब जाने के सिवा और कोई तदबीर नहीं। मैं अमीर नहीं हूँ, मुझे फ़य्याज़ी का दावा है। मगर अपने क़लम की बदौलत आप साहिबान की इनायात की बदौलत किसी का मुहताज नहीं। क्या मैं ऐसा कमीना हो जाऊँगा कि एक बेकस औरत के रुपये हज़म करलूं।

    पंचों ने यक ज़बान हो कर फिर कहा, नहीं नहीं, आपसे ऐसा नहीं हो सकता।

    पगड़ी की नगरी है पंचों ने मुंशी जी को रिहा कर दिया। पंचायत ख़त्म हो गई और मूंगा को अब किसी ख़याल से तस्कीन हो सकती थी तो वो ये था कि यहां दिया, सही, वहां कहाँ जाएगा।

    मूंगा का अब कोई गम ख़्वार मददगार था। नादारी से जो कुछ तकलीफ़ें हो सकती हैं वो सब उसे झेलनी पड़ीं, उसके क़वा दुरुस्त थे, वो चाहती तो मेहनत कर सकती थी मगर जिस दिन पंचायत ख़त्म हुई, उसी दिन से उसने काम करने की क़सम खाई, अब उसे रात-दिन रूपों की रट लगी हुई थी।

    उठते-बैठते, सोते-जागते उसे सिर्फ़ एक काम था और वो मुंशी राम सेवक का ज़िक्र-ए-ख़ैर था। अपने झोंपड़े के दरवाज़े पर बैठी वो रात-दिन उन्हें सिद्क़-ए-दिल से दुआएं दिया करती और अक्सर दुआओं में ऐसे शायराना तिलामज़े, ऐसे रंगीन इस्तिआरे इस्तेमाल करती जिसे सुनकर हैरत होती थी।

    रफ़्ता-रफ़्ता मूंगा के हवास पर-वहशत का ग़लबा हुआ। नंगे-सर, नंगे बदन, हाथ में एक कुल्हाड़ा लिए वो सुनसान जगहों में जा बैठती। झोंपड़े के बजाय अब वो मरघट पर नदी के किनारे खंडरों में घूमती दिखाई देती। बिखरी हुई परेशान लटें... सुर्ख़ आँखें... वहशतनाक चेहरा... सूखे हुए हाथ पांव उसकी... ये हैयत कदाई देखकर लोग डर जाते थे, उसे कोई मज़ाह के तौर पर छेड़ता था। अगर वो कभी गांव में निकल आती तो औरतें घरों के किवाड़ बंद कर लेतीं। मर्द कतराकर निकल जाते और बच्चे चीख़ चीख़ कर भाग जाते, अगर कोई लड़का भागता तो ये मुंशी राम सेवक का साहबज़ादा राम ग़ुलाम था बाप में जो कुछ कोर कसर रह गई थी वो उनकी ज़ात में पूरी हो गई थी लड़कों का उसके मारे नाक में दम था। गांव के काने और लंगड़े आदमी उसकी सूरत से बेज़ार थे और गालियां खाने में शायद ससुराल में आने वाले दामाद को भी उतना मज़ा आता होगा। वो मूंगा के पीछे तालियाँ बजा ताकतों को साथ लिए उस वक़्त तक रहता जब तक वो ग़रीब तंग आकर निकल जाती। रुपया-पैसा होश-ओ-हवास खोकर उसे पगली का लक़ब मिला और वो सचमुच पगली थी, अकेले बैठे हुए आप ही आप घंटों बातें किया करती जिसमें राम सेवक के गोश्त-हड्डी, पोस्त-आँखें, कलेजा वग़ैरा को खाने मसलने नोचने खसोटने की पुरजोश ख़्वाहिश का इज़हार होता था और जब ये ख़्वाहिश बेताबी तक पहुंच जाती तो राम सेवक के मकान की तरफ़ मुँह करके बुलंद आवाज़ और डरावनी आवाज़ से हाँक लगाती, तेरा लहू पियूँगी।

    अक्सर रातों के सन्नाटे में ये गरजती हुई आवाज़ सुनकर औरतें चौंक पड़ती थीं, मगर उस आवाज़ से ज़्यादा हैबतनाक उसका क़हक़हा था, मुंशी जी के ख़याली लहू पीने की ख़ुशी में वो ज़ोर ज़ोर से हंसा करती थी, उस क़हक़हे से ऐसी शैतानी मसर्रत ऐसी सफ़ाकी, ऐसी खूंख़्वारी टपकती थी कि रात को लोगों के ख़ून सर्द हो जाते थे, मालूम होता था कि गोया सैंकड़ों उल्लू एक साथ हंस रहे हैं।

    मुंशी राम सेवक बड़े हौसला जिगर के आदमी थे, उन्हें दीवानी का ख़ौफ़ था, फ़ौजदारी का, मगर मूंगा के इन ख़ौफ़नाक नारों को सुनकर वो भी सहम जाते थे। हमें इन्सानी इन्साफ़ का चाहे ख़ौफ़ हो और बसा-औक़ात नहीं होता। मगर ख़ुदाई इन्साफ़ का ख़ौफ़ हर इन्सान के दिल में ख़लक़ी तौर पर मौजूद रहता है और कभी कभी ऐसे मुबारक इत्तिफ़ाक़ात पेश आजाते हैं जब नफ़्स के नीचे दबा हुआ...ये ख़याल ऊपर आजाता है। मूंगा की वहशतनाक शबगर्दी राम सेवक के लिए यही मुबारक इत्तिफ़ाक़ थी और उनसे ज़्यादा उनकी बीवी के लिए जो एक वफ़ादार औरत की तरह हर मुआमले में सिर्फ़ औरत का साथ देती थी बल्कि आए दिन के मुबाहिसों और मुनाज़रों में ज़्यादा नुमायां हिस्सा लिया करती थी। फ़िर्क़ा-ए-इनास में उनके ज़ोर-ए-बयान का आम शहरा था। ज़बानी मुआमलात हमेशा वही तय किया करती थीं। उन लोगों की भूल थी जो कहते थे कि मुंशी जी की ज़बान पर सरस्वती है। ये फ़ैज़ उनकी बीवी को हासिल था। ज़ोर बयान में उन्हें वही मलिका थी जो मुंशी जी को ज़ोर-ए-तहरीर में और ये दोनों पाक रूहें अक्सर आलम-ए-मजबूरी में... मश्वरा करतीं कि अब क्या करना चाहिए।

    आधी रात का वक़्त था।

    मुंशी जी हस्ब-ए-मामूल ग़म ग़लत करने के लिए आब-ए-आतशीं के दो-चार घूँट पी कर सो गए थे।

    यकायक मूंगा ने उनके दरवाज़े पर आकर ज़ोर से हाँक लगाई,

    तेरा लहू पियूँगी। और ख़ूब खिलखिला कर हंसी।

    मुंशी जी ये ख़ौफ़नाक क़हक़हा सुनकर चौंक पड़े, ख़ौफ़ से पांव थरथरा रहे थे और कलेजा धक धक कर रहा था। दिल पर बहुत जब्र करके दरवाज़ा खोला और जाकर नागिन को जगाया।

    नागिन ने झल्लाकर कहा,

    क्या है? क्या कहते हो?

    मुंशी जी ने आवाज़ दबा कर कहा, वो दरवाज़े पर आकर खड़ी है।

    नागिन उठ बैठी, क्या कहती है?

    तुम्हारा सर।

    क्या दरवाज़े पर गई?

    हाँ, आवाज़ नहीं सुनती हो।

    नागिन मूंगा से नहीं डरती थी मगर उसकी वहशत से डरती थी, ताहम उसे यक़ीन था कि मैं तक़रीर में ज़रूर उसे नीचा दिखा सकती हूँ।

    सँभल कर बोली, तो मैं उससे दो बातें करलूं।

    मगर मुंशी जी ने मना किया।

    दोनों आदमी दहलीज़ पर आगए और दरवाज़े से झांक कर देखा, मूंगा की धुँदली मूरत ज़मीन पर पड़ी थी और उसकी सांस तेज़ी से चलती सुनाई देती थी। राम सेवक के ख़ून और गोश्त की आरज़ू में वो अपना गोश्त और ख़ून ख़ुश्क कर चुकी थी, एक बच्चा भी उसे गिरा सकता था मगर उससे सारा गांव डरता था।

    हम ज़िंदा इन्सानों से नहीं डरते हैं मुर्दों से डरते हैं।

    अगरचे अंदर से दरवाज़ा बंद था मगर मुंशी जी और नागिन ने बैठ कर रात काटी, मूंगा अंदर नहीं आसकती थी मगर उसकी आवाज़ को कौन रोक सकता था।

    मूंगा से ज़्यादा डरावनी उसकी आवाज़ थी।

    सुब्ह के वक़्त मुंशी जी बाहर निकले और मूंगा से बोले, यहां क्यों पड़ी है?

    मूंगा बोली, तेरा ख़ून पियूँगी।

    नागिन ने बल खाकर कहा, तेरा मुँह झुलस दूँगी।

    मगर नागिन के ज़हरने मूंगा पर कुछ असर किया, उसने ज़ोर से क़हक़हा लगाया, नागिन खिसियानी हो गई। क़हक़हे के मुक़ाबले में ज़बान बंद हो जाती है।

    मुंशी जी फिर बोले, यहां से उठ जाओ।

    उठूँगी।

    कब तक पड़ी रहेगी?

    तेरा लहू पी कर जाऊँगी।

    मुंशी जी की पुर-ज़ोर तहरीर का यहां कुछ ज़ोर चला और नागिन की आतिशीं तक़रीर यहां सर्द हो गई।

    दोनों घर में जाकर मश्वरा करने लगे। ये बला क्यूँकर टलेगी, इस आफ़त से क्यूँकर नजात होगी।

    देवी आती हैं तो बकरे का ख़ून पी कर चली जाती हैं मगर ये डायन इन्सान का ख़ून पीने आई है। वो ख़ून जिसके अगर क़लम बनाने में चंद क़तरे निकल पड़ते थे। तो हफ़्तों और महीनों सारे कुन्बे को अफ़सोस रहता था। और ये वाक़िया गांव में मर्कज़-ए-गुफ़्तगू बन जाता था। क्या ये ख़ून पी कर मूंगा का सूखा हुआ जिस्म बुरा हो जाएगा।

    गांव में ख़बर फैल गई। मूंगा मुंशी जी के दरवाज़े पर धरना दिये बैठी है। मुंशी जी की रुस्वाई में गांव वालों को ख़्वाह-मख़्वाह लुत्फ़ आता था। सैंकड़ों आदमी जमा हो गए। उस दरवाज़े पर वक़्तन फ़वक़्तन मेले लगे रहते थे। मगर वो ज़ोर शोर पुरजोश मेले होते थे। आज का मज्मा ख़ामोश और मतीन था। ये रुकाव और हब्स राम ग़ुलाम को मर्ग़ूब था। मूंगा पर उसे ऐसा ग़ुस्सा आरहा था कि उसका बस चलता तो ज़रूर कुवें में ढकेल देता। कहता चल कुवें पर तुझे पानी पिला लाऊँ, जब वो कुवें पर पहुंची तो पीछे से ऐसा धक्का देता कि अड़ाड़ा धम कुवें में जा गिरती और पिटे हुए कुत्ते की तरह चीख़ने लगती। धमाके की आवाज़ आती।

    इस ख़याल से राम ग़ुलाम के सीने में गुदगुदी सी होने लगी और वो मुश्किल से अपनी हंसी रोक सका। कैसे मज़े की बात होती। मगर ये चुड़ैल यहां से उठती ही नहीं क्या करूँ।

    मुंशी जी के घर में इस्तिख़्वानी नस्ल की एक गाय थी, खली दाना और भूसा तो उसे कसरत से खिलाया जाता था