ग़म मुझे हसरत मुझे वहशत मुझे सौदा मुझे

सीमाब अकबराबादी

ग़म मुझे हसरत मुझे वहशत मुझे सौदा मुझे

सीमाब अकबराबादी

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    ग़म मुझे हसरत मुझे वहशत मुझे सौदा मुझे

    एक दिल दे कर ख़ुदा ने दे दिया क्या क्या मुझे

    है हुसूल-ए-आरज़ू का राज़ तर्क-ए-आरज़ू

    मैं ने दुनिया छोड़ दी तो मिल गई दुनिया मुझे

    ये नमाज़-ए-इश्क़ है कैसा अदब किस का अदब

    अपने पा-ए-नाज़ पर करने भी दे सज्दा मुझे

    कह के सोया हूँ ये अपने इज़्तिराब-ए-शौक़ से

    जब वो आएँ क़ब्र पर फ़ौरन जगा देना मुझे

    सुब्ह तक क्या क्या तिरी उम्मीद ने ताने दिए

    गया था शाम-ए-ग़म इक नींद का झोका मुझे

    देखते ही देखते दुनिया से मैं उठ जाऊँगा

    देखती की देखती रह जाएगी दुनिया मुझे

    जल्वा-गर है इस में 'सीमाब' इक दुनिया-ए-हुस्न

    जाम-ए-जम से है ज़ियादा दिल का आईना मुझे

    स्रोत:

    • पुस्तक : Intekhab-e-Sukhan(Jild-2) (पृष्ठ 257)
    • रचनाकार : Hasrat Mohani
    • प्रकाशन : uttar pradesh urdu academy (1983)
    • संस्करण : 1983

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