आज के चुनिन्दा 5 शेर

कल तुम जो बज़्म-ए-ग़ैर में आँखें चुरा गए

खोए गए हम ऐसे कि अग़्यार पा गए

मोमिन ख़ाँ मोमिन
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किताब-ए-ज़ीस्त का उनवान बन गए हो तुम

हमारे प्यार की देखो ये इंतिहा साहब

इन्दिरा वर्मा

शफ़क़ हूँ सूरज हूँ रौशनी हूँ

सलीब-ए-ग़म पर उभर रहा हूँ

अय्यूब साबिर

ये महल ये माल दौलत सब यहीं रह जाएँगे

हाथ आएगी फ़क़त दो गज़ ज़मीं मरने के बाद

गणेश बिहारी तर्ज़

हवा-ए-कूफ़ा-ए-ना-मेहरबाँ को हैरत है

कि लोग ख़ेमा-ए-सब्र-ओ-रज़ा में ज़िंदा हैं

इरफ़ान सिद्दीक़ी
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आज का शब्द

मिज़्गान

  • mizhgaan
  • مژگان

शब्दार्थ

eyelashes

एक एक क़तरे का मुझे देना पड़ा हिसाब

ख़ून-ए-जिगर वदीअत-ए-मिज़्गान-ए-यार था

शब्दकोश

Quiz A collection of interesting questions related to Urdu poetry, prose and literary history. Play Rekhta Quiz and check your knowledge about Urdu!

The word 'Taqreer' means?
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क्या आप जानते हैं?

चंदा जमा करने और किसी की ख़ूबसूरती को चंदे आफ़ताब चंदे माहताब कहने में क्या रिश्ता है? ये रिश्ता शब्द "चंद" का है। फ़ारसी शब्द चंद का अर्थ होता है थोड़ा सा, कुछ।
गुज़ारी थीं ख़ुशी की चंद घड़ियां
उन्हीं की याद में मेरी ज़िन्दगी है
उर्दू में इसी से शब्द चंदा बन गया। जब किसी काम के लिए चंदा जमा किया जाता है तो बहुत से लोग कुछ, थोड़ी थोड़ी सी रक़म देते हैं और किसी के हुस्न की तारीफ़ में चंदे आफ़ताब और चंदे माहताब का अर्थ है कि वो कुछ कुछ सूरज सी और कुछ कुछ चांद सी लगती है या लगता है।
चंद से ही शब्द "चंदां" का रिश्ता भी है जो प्रायः इस तरह बोला जाता है:
"आप को इस मुआमले में फ़िक्र करने की चंदां ज़रूरत नहीं, मैं हूं ना।" अर्थात शब्द चंदां ज़रा सा, थोड़ा सा या बिल्कुल के मायने में इस्तेमाल होता है।

क्या आप जानते हैं?

दिलावर

उर्दू के हास्य-व्यंग्य के प्रसिद्ध शायर दिलावर फ़िगार (1929-1998) की हास्य शायरी का राज़ सबसे पहले बदायूं के एक मुशायरे में शकील बदायूंनी ने खोला था, जिसमें दिलीप कुमार भी मौजूद थे। शकील जो मुशायरे का संचालन कर रहे थे उन्होंने एक शायर से स्वीकार करा ही लिया कि जो हास्य नज़्म वह पढ़ रहे हैं वह दिलावर फ़िगार की लिखी हुई है। वास्तव में उस ज़माने में दिलावर फ़िगार अपने दोस्तों को हास्य नज़्में लिख कर दे देते थे और ख़ुद अपनी संजीदा ग़ज़लें मुशायरों में तरन्नुम से सुनाते थे जो बहुत अच्छा भी नहीं था। उस समय उनका तख़ल्लुस शबाब हुआ करता था। उस मुशायरे से उनका परिचय  मज़ाहिया (हास्य) शायर के रूप में हुआ और फिर बहुत मशहूर हुए और फ़िगार तख़ल्लुस अपना लिया।
क्या आप जानते हैं कि वो छंद शास्त्र के भी ज्ञाता थे और उन्होंने अंग्रेज़ी की 100 चुनींदा कविताओं का उत्कृष्ट अनुवाद भी किया था जो "ख़ुशबू का सफ़र" शीर्षक से पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुआ था।

क्या आप जानते हैं?

नौबत बजना तो आपने सुना होगा लेकिन क्या आप जानते हैं कि
अमीरों और बादशाहों की ड्योढ़ी पर निर्धारित समय या किसी विशेष अवसर पर बजाये जाने वाले बाजों को नौबत कहा जाता था, जिसमें नक़्क़ारे,तबल और नफ़ीरी शामिल होते थे।नफ़ीरी बांसुरी जैसा एक वाद्य है। जब यह तीनों साथ बजते थे तब उसे नौबत बजना कहते थे। वो जगह जहां नौबत बजती थी उसे नौबत ख़ाना कहते थे।
इसके अलावा शब्द नौबत बुरी हालत,दुर्गत या बुरे हाल के मायने में भी इस्तेमाल होता है। नौबत आना एक मुहावरा है, जैसे "वह ख़ानदानी रईस थे लेकिन अब यह नौबत आ गई कि दूसरों के सामने हाथ फैलाना पड़ता है।"
इसी मुहावरे को शे'र में कुछ इस तरह बरता गया है:
मैं आईना बनूंगा तो पत्थर उठाएगा
इक दिन खुली सड़क पे ये नौबत भी आएगी

क्या आप जानते हैं?

अख़्तरुल

अख़्तरुल ईमान उर्दू नज़्म के श्रेष्ठ कवि और बहुत मशहूर व कामयाब फ़िल्म स्क्रिप्ट राइटर और संवाद लेखक थे। अपने लेखन के हवाले से वह बहुत कठोर थे। एक बार वह किसी फ़िल्म के संवाद लिख रहे थे जिसके हीरो दिलीप कुमार थे। उन्होंने किसी संवाद में तब्दीली करने के लिए अख़्तरुल ईमान का लिखा हुआ संवाद काट कर अपने क़लम से कुछ लिखना चाहा। अख़्तरुल ईमान ने उन्हें सख़्ती से रोक दिया कि वे उनके लिखे हुए को न काटें, अपनी आपत्ति ज़बानी बताएं, अगर बदलना होगा तो वह स्वयं अपने क़लम से बदलेंगे। 
उन्होंने फ़िल्मों के लिए कभी गीत नहीं लिखे लेकिन उनके लिखे हुए कुछ संवाद इतने मशहूर हुए कि दर्शकों को याद हो गए थे। फ़िल्म "क़ानून" जिसमें कोई गाना नहीं था, उनके संवाद के कारण बहुत सफल रही थी।
क्या आप जानते हैं कि वो छात्र जीवन में एक उत्कृष्ट वक्ता थे और हमेशा वाद-विवाद प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार प्राप्त करते थे। एक बार उन्हें तीसरा पुरस्कार मिला तो उन्होंने यह कहकर पुरस्कार वापस कर दिया कि निर्णय में ग़लती हो गई है,यह पुरस्कार किसी ज़रूरतमंद को दे दिया जाए।

क्या आप जानते हैं?

शब्द 'उस्ताद' फ़ारसी से उर्दू में आया। इसका सफ़र ज़रतुश्त धर्म की किताब 'अवेस्ता' से शुरू हुआ जो प्राचीन ईरानी भाषा में थी और उसके समझने वाले भी बहुत कम थे। 'अवेस्ता' के जानने वाले को 'अवेस्ता वैद' कहा जाता था। शब्द 'वैद' आज भी 'हकीम' या 'ज्ञानी' के लिए इस्तेमाल होता है।
समय के साथ साथ यह शब्द पहले 'अवेस्ता विद' हुआ फिर 'उस्ताद' हो गया। शुरू में यह शब्द धार्मिक ग्रंथों के समझने समझाने वालों के लिए ही इस्तेमाल होता था, बाद में यह हर तरह की शिक्षा देने वालों के लिए आम हो गया और फिर हर कला के विशेषज्ञ को भी उस्ताद कहा जाने लगा। यह शब्द हिंदुस्तानी क्लासिकी संगीत के बड़े कलाकारों के नाम का हिस्सा ही बन गया। अब आम बोलचाल में यह शब्द नित नए ढंग से मिलता है। चालाकी करना 'उस्तादी दिखाना' बन गया है। बेतकल्लुफी से यार दोस्त भी एक दूसरे को उस्ताद कह कर संबोधित करते हैं। हिंदुस्तानी फ़िल्मों में भी भांति भांति के अच्छे-बुरे पात्र 'उस्ताद' के रूप में नज़र आते हैं और 'उस्तादों के उस्ताद', 'दो उस्ताद' और 'उस्तादी उस्ताद की' जैसे नामों वाली फ़िल्में भी मिल जाती हैं।
शागिर्द हैं हम मीर से उस्ताद के रासिख़
उस्तादों का उस्ताद है उस्ताद हमारा

आज की प्रस्तुति

अभी से कैसे कहूँ तुम को बेवफ़ा साहब

अभी तो अपने सफ़र की है इब्तिदा साहब

How can I call you unfaithful already

When this is only the beginning of our journey, sahab

How can I call you unfaithful already

When this is only the beginning of our journey, sahab

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