आज के चुनिन्दा 5 शेर

तुम ज़माने की राह से आए

वर्ना सीधा था रास्ता दिल का

बाक़ी सिद्दीक़ी
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ज़िंदगी तू ने मुझे क़ब्र से कम दी है ज़मीं

पाँव फैलाऊँ तो दीवार में सर लगता है

बशीर बद्र

साहिल के सुकूँ से किसे इंकार है लेकिन

तूफ़ान से लड़ने में मज़ा और ही कुछ है

आल-ए-अहमद सूरूर
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यहाँ लिबास की क़ीमत है आदमी की नहीं

मुझे गिलास बड़े दे शराब कम कर दे

बशीर बद्र

ये इश्क़ नहीं आसाँ इतना ही समझ लीजे

इक आग का दरिया है और डूब के जाना है

जिगर मुरादाबादी
आज का शब्द

पिंदार

  • pindaar
  • پندار

शब्दार्थ

pride/ conceit

मेरी ख़ातिर सही अपनी अना की ख़ातिर

अपने बंदों से तो पिंदार ख़ुदाई ले ले

शब्दकोश

क्या आप जानते हैं?

Kaghzi

इस्मत चुग़ताई की अपूर्ण आत्मकथा "काग़ज़ी है पैरहन" उनके देहांत के बाद प्रकाशित हुई। असल में इस्मत पत्रिका 'आज कल' में अपनी जीवनी क़िस्तों में लिख रही थीं। 1971 से 1980 तक चौदह अध्याय प्रकाशित हुए थे, लेकिन उनकी जीवनी पूरी न हो सकी। उल्लेखित किताब में सिवाए कहानी 'लिहाफ़' पर अश्लीलता के मुक़दमे के लिए लाहौर यात्रा का दिलचस्प वर्णन और अलीगढ़ में 'अंगारे' के प्रकाशन पर हंगामे के वर्णन के, प्रगतिशील साहित्य का अधिक विवरण नहीं है,न ही बंबई की फ़िल्म नगरी के क़िस्से हैं।
इस किताब में बस इस्मत की बेबाक, बाहिम्मत,कोमल और दर्द मंद व्यक्तित्व है और एक अनोखे और दिलचस्प ख़ानदान के रहन सहन, रीति रिवाज, हठधर्मियों, नफ़रतों और मोहब्बतों की एक अजीब दास्तान है जो कई शहरों में फैली हुई है। इस किताब में इस्मत के मामूंज़ाद भाई जुगनू से मुलाक़ात होती है जो उनका पहला प्यार था। एक कहानी मध्य प्रदेश की रियासत जावरा के नवाब के बारे में है, जहां उनके भाई मुलाज़िम थे। इस्मत को कुछ महीनों के लिए नवाब की लड़कियों को पढ़ाने की ज़िम्मेदारी दी गई थी। इस्मत किस तरह से उनके आलसी और बेकार किसी एक बेटे की बीवी बनने से बच कर निकलीं, यह बहुत विचित्र और दिलचस्प घटना है। किताब में एक जगह उन्होंने मरने के बाद क़ब्र में दफ़न होने के ख़ौफ़ का उल्लेख भी किया है जो शायद मौत के बाद स्वयं के दाह संस्कार करने की उनकी वसीयत का कारण हो।

आर्काइव

आज की प्रस्तुति

प्रमुख उत्तर कलासिकी शायर / अपने शेर ‘बड़े ग़ौर से सुन रहा था ज़माना...’ के लिए मशहूर

हिज्र की शब नाला-ए-दिल वो सदा देने लगे

सुनने वाले रात कटने की दुआ देने लगे

पूर्ण ग़ज़ल देखें

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