aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "dinner"
तिरे करम की कोई हद नहीं हिसाब नहींचबा के नान-ए-शबीना मैं सोचता ही रहा
डिनर पे आज कोई उस सा आश्ना भी न थावो इस से पहले अगरचे कहीं मिला भी न था
तिरे वादा-ए-रिज़्क की है दुहाई अगर रिज़्क़ आज़ूक़ा-ए-रूह भी हैतो हम तो हैं महरूम-ए-नान-ए-शबीना हयात-आफ़रीना हयात-आफ़रीना
उठ रहा है दिल से आहों का धुआँमहफ़िल-ए-शब महफ़िल-ए-इशरत न थी
सैंकड़ों तरह की चीज़ें थीं डिनर में लेकिनये तो फ़रमाएँ वहाँ क़ीमा-ए-ख़िंज़ीर भी था
बे-लौस पेश की गईं मुनकिर को सोहबतेंहम को 'इशाइया भी सँभल कर दिया गया
अगरचे सब थे फ़क़त चाँद ही नहीं आयासो अब के महफ़िल-ए-शब में बहुत सितारे लगे
शाम से पहले दर्द की दौलत मौजें हैं बे-नाम सीदरियाओं से मिल के दरिया बल खाएँगे शाम को
रात की कैफ़िय्यत याद आईशाम हुई है सुब्ह सवेरे
शाम होते ही यहाँ आमद-ए-महताब के साथख़ाना-ए-दिल में तिरी याद का ग़म खुलता है
Devoted to the preservation & promotion of Urdu
A Trilingual Treasure of Urdu Words
Online Treasure of Sufi and Sant Poetry
World of Hindi language and literature
The best way to learn Urdu online
Best of Urdu & Hindi Books