aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
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कोई मक़्तल में न पहुँचा कौन ज़ालिम था जिसेतेग़-ए-क़ातिल से ज़ियादा अपना सर अच्छा लगा
ये का'बे से नहीं बे-वज्ह निस्बत-ए-रुख़-ए-यारये बे-सबब नहीं मुर्दे को क़िबला-रू करते
दिल-आशुफ़्तगाँ ख़ाल-ए-कुंज-ए-दहन केसुवैदा में सैर-ए-अदम देखते हैं
रिश्ता-ए-तेग़-ओ-गुलू अब भी सलामत है 'फ़राज़'अब भी मक़्तल की तरफ़ दिल सा जवाँ खेंचता है
देखा जो खा के तीर कमीं-गाह की तरफ़अपने ही दोस्तों से मुलाक़ात हो गई
सय्याद-ओ-निगहबान-ए-चमन पर है ये रौशनआबाद हमीं से है नशेमन भी क़फ़स भी
ग़ैरों के साथ छोड़ के तुम नक़्श-ए-पा चलेक्या ख़ूब फूल गोर पे मेरी चढ़ा चले
तलवार लिए वो नहीं मक़्तल में खड़े हैंइस वक़्त मिरे आगे मिरी मौत खड़ी है
क़ब्र पर बाद-ए-फ़ना आइएगाबे-महल पाँव न फैलाइएगा
मक़्तल को जा रहा हूँ ये 'मंसूर' सोच करछींटा कोई लहू का तो उन पर भी आएगा
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