aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
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कभी ये हाल कि दोनों में यक-दिली थी बहुतकभी ये मरहला जैसे कि आश्नाई न थी
मुद्दतों बा'द उस ने आज मुझ से कोई गिला कियामंसब-ए-दिलबरी पे क्या मुझ को बहाल कर दिया
वो मरहला है कि अब सैल-ए-ख़ूँ पे राज़ी हैंहम इस ज़मीन को शादाब देखने के लिए
या-रब ये मक़ाम-ए-इश्क़ है क्या गो दीदा-ओ-दिल नाकाम नहींतस्कीन है और तस्कीन नहीं आराम है और आराम नहीं
उस दरीचे में भी अब कोई नहीं और हम भीसर झुकाए हुए चुप-चाप गुज़र जाते हैं
कोई भी तो दिखाओ मंज़िल परजिस को देखा हो रहनुमा के सिवा
रौशनी ऐसी अजब थी रंग-भूमी की 'नसीम'हो गए किरदार मुदग़म कृष्ण भी राधा लगा
तुझे क्या ख़बर मिरे हम-सफ़र मिरा मरहला कोई और हैमुझे मंज़िलों से गुरेज़ है मेरा रास्ता कोई और है
मता-ए-बे-बहा है दर्द-ओ-सोज़-ए-आरज़ूमंदीमक़ाम-ए-बंदगी दे कर न लूँ शान-ए-ख़ुदावंदी
'अंजुम' पे हँस रहा है तो हँसता रहे जहाँमैं बे-वक़ूफ़ियों का बुरा मानती नहीं
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