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ग़ज़ल
तुझे हादसात-ए-पैहम से भी क्या मिलेगा नादाँ
तिरा दिल अगर हो ज़िंदा तो नफ़स भी ताज़ियाना
जिगर मुरादाबादी
नज़्म
जुगनू
कहूँ कि पढ़ के सुना तो मिरी किताब मुझे
फिर इस के ब'अद दिखाऊँ उसे मैं वो कापी
फ़िराक़ गोरखपुरी
समस्त
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ग़ज़ल
हार और जीत की पूरी ज़िम्मेदारी लेनी पड़ती है
उज़्र उस चालाक से कोई कैसे खेले छूट के साथ
अज़हर फ़राग़
नज़्म
होली
कोई दिलाती है साथिन को यार की सौगंद
कि अब तो जामा-ओ-अंगिया के टोले हैं सब बंद
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
स्टेटस मैरिज
मिस्र की काली हो या हो चीन की चिपटी कोई
कार्बन कापी को औराक़-ए-जली कहता रहा

