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ग़ज़ल
वाँ वो ग़ुरूर-ए-इज्ज़-ओ-नाज़ याँ ये हिजाब-ए-पास-ए-वज़अ
राह में हम मिलें कहाँ बज़्म में वो बुलाए क्यूँ
मिर्ज़ा ग़ालिब
नज़्म
परछाइयाँ
वो पेड़ जिन के तले हम पनाह लेते थे
खड़े हैं आज भी साकित किसी अमीं की तरह
साहिर लुधियानवी
नज़्म
एक लड़का
ख़ुदा-ए-इज़्ज़-ओ-जल की नेमतों का मो'तरिफ़ हूँ मैं
मुझे इक़रार है उस ने ज़मीं को ऐसे फैलाया
अख़्तरुल ईमान
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आज
आज
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नज़्म
किसान
जिस के माथे के पसीने से पए-इज़्ज़-ओ-वक़ार
करती है दरयूज़ा-ए-ताबिश कुलाह-ए-ताजदार
जोश मलीहाबादी
नज़्म
ख़ाक-ए-हिंद
तेरे जबीं से नूर-ए-हुस्न-ए-अज़ल अयाँ है
अल्लाह-रे ज़ेब-ओ-ज़ीनत क्या औज-ए-इज़्ज़-ओ-शाँ है
चकबस्त बृज नारायण
ग़ज़ल
ब-इज्ज़-आबाद वहम-ए-मुद्दआ तस्लीम-ए-शोख़ी है
तग़ाफ़ुल को न कर मसरूफ़-ए-तम्कीं-आज़माई का
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
मुझे ग़ैर-ए-इज्ज़-ओ-नियाज़ ने तिरे दर पे जा के झुका दिया
न तो कोई अहद लिखा गया न तो कोई रस्म अदा हुई
मुज़्तर ख़ैराबादी
ग़ज़ल
दर्द-ए-सर उन के लिए क्यूँ है मिरा इज्ज़-ओ-नियाज़
मेरे सज्दों से वो क्यूँ चीं-ब-जबीं होते हैं
सीमाब अकबराबादी
नज़्म
इल्म की ज़रूरत
यही क़ौमों को पहुँचाता है बाम-ए-औज-ओ-रिफ़अत पर
यही मुल्कों के अंदर फूँकता है रूह-ए-बेदारी









