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ग़ज़ल
मिरी ख़्वाहिश के जितना कब हुआ मुझ में सराबाँ
कि बहर-ए-दश्त के कौन-ओ-मकाँ में दिन नहीं था
बिलाल असवद
ग़ज़ल
अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़'
जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें
अहमद फ़राज़
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विषय
सराब
सराब शायरी
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नज़्म
ज़ुल्मत को ज़िया सरसर को सबा बंदे को ख़ुदा क्या लिखना
ऐ मेरे वतन के फ़नकारो ज़ुल्मत पे न अपना फ़न वारो
ये महल-सराओं के बासी क़ातिल हैं सभी अपने यारो
हबीब जालिब
नज़्म
ला-इलाहा-इल्लल्लाह
ख़ुदी का सिर्र-ए-निहाँ ला-इलाहा-इल्लल्लाह
ख़ुदी है तेग़ फ़साँ ला-इलाहा-इल्लल्लाह
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
रफ़्ता रफ़्ता वो मिरी हस्ती का सामाँ हो गए
पहले जाँ फिर जान-ए-जाँ फिर जान-ए-जानाँ हो गए
तस्लीम फ़ाज़ली
ग़ज़ल
तिरी जुस्तुजू में निकले तो 'अजब सराब देखे
कभी शब को दिन कहा है कभी दिन में ख़्वाब देखे
जमील मलिक
ग़ज़ल
ये सर्द रातें भी बन कर अभी धुआँ उड़ जाएँ
वो इक लिहाफ़ मैं ओढूँ तो सर्दियाँ उड़ जाएँ
राहत इंदौरी
ग़ज़ल
दफ़्न जब ख़ाक में हम सोख़्ता-सामाँ होंगे
फ़िल्स माही के गुल-ए-शम-ए-शबिस्ताँ होंगे