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ग़ज़ल
शाम सुर्मा दर-गुलू है तो सहर पम्बा-ब-गोश
किस जहाँ में 'फ़ैज़' को तू ने ग़ज़ल-ख़्वाँ कर दिया
फ़ैज़ झंझानवी
ग़ज़ल
ग़ुरूर-ए-चाक-ए-जुनूँ 'फ़ैज़' सर-निगूँ न हुआ
हज़ार ख़ार-ए-मुग़ीलाँ बढ़े रफ़ू के लिए
फ़ैज़ झंझानवी
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रेख़्ता शब्दकोश
naam buraa hai
नाम बुरा हैنام بُرا ہے
۔ بدنام ہونے کی جگہ مستعمل ہے۔ ؎
kyo.n guu khaataa hai
क्यों गू खाता हैکِیُوں گُو کھاتا ہے
जान बूओझ कर क्यों ग़लत काम करते हो, क्यों झूओट बोलते हो
guu kaa putlaa hai
गू का पुतला हैگُو کا پُتلا ہے
अभी छोटा बच्चा है
lagii burii hotii hai
लगी बुरी होती हैلَگی بُری ہوتی ہے
تب جانو گے ہاں لگی بُری ہوتی ہے۔
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नज़्म
बहरा गोया
बुलंद-आहंगियों ने फाड़ डाले कान के पर्दे
हूँ वो मुतरिब जो ख़ुद अपनी सदा ही सुन नहीं सकता
परवेज़ शाहिदी
रुबाई
फ़क़ हो गया रंग मैं ने गुल-रू जो कहा या'नी उन को
तश्बीह का बार है उठाना मुश्किल नाज़ुक है मियाँ
मीर मेहदी मजरूह
ग़ज़ल
कभी था नाज़ ज़माने को अपने हिन्द पे भी
पर अब उरूज वो इल्म-ओ-कमाल-ओ-फ़न में नहीं