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शेर
इल्तिफ़ात-ए-यार था इक ख़्वाब-ए-आग़ाज़-ए-वफ़ा
सच हुआ करती हैं इन ख़्वाबों की ताबीरें कहीं
हसरत मोहानी
ग़ज़ल
इल्तिफ़ात-ए-यार था इक ख़्वाब-ए-आग़ाज़-ए-वफ़ा
सच हुआ करती हैं इन ख़्वाबों की ताबीरें कहीं
हसरत मोहानी
ग़ज़ल
हर्फ़-ए-आग़ाज़-ए-सदा-ए-कुन-फ़काँ था और मैं
रक़्स में सूरज था पीला आसमाँ था और मैं
सय्यद नसीर शाह
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ग़ज़ल
'रवाँ' किस को ख़बर उनवान-ए-आग़ाज़-ए-जहाँ क्या था
ज़मीं का क्या था नक़्शा और रंग-ए-आसमाँ क्या था
जगत मोहन लाल रवाँ
नज़्म
फ़र्ज़ करो
फ़र्ज़ करो हम अहल-ए-वफ़ा हों, फ़र्ज़ करो दीवाने हों
फ़र्ज़ करो ये दोनों बातें झूटी हों अफ़्साने हों
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
ये कौन आया
मक़्सूद-ए-वफ़ा सुन ले क्या साफ़ है सादा है
जीने की तमन्ना है मरने का इरादा है
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
दिल-आशोब
पर इश्क़ ओ वफ़ा के याद रहे आदाब इसे
तिरा नाम ओ मक़ाम जो पूछा, हँस कर टाल गया

