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ग़ज़ल
इस ज़वाल-ए-अंजुमन में 'आरज़ू' तू ही बता
किस को कह दूँ बज़्म-आराई किसे आवाज़ दूँ
अन्जुमन मंसूरी आरज़ू
ग़ज़ल
रह गए हम 'आरज़ू' दिल की दबा कर दिल में ही
नक़्श-ए-पा उन की तमन्ना के मिटाते रह गए
अन्जुमन मंसूरी आरज़ू
ग़ज़ल
'आरज़ू' क्यों हो हमें ‘उम्र-दराज़ी की जब
ज़िंदगी हम तिरे सब सूद-ओ-ज़ियाँ जानते हैं
अन्जुमन मंसूरी आरज़ू
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ग़ज़ल
तुम ने ख़ुद नाकाम रख के उस की हिम्मत की थी पस्त
आरज़ू-ए-बे-गुनह पर मुफ़्त का इल्ज़ाम था
आरज़ू लखनवी
ग़ज़ल
हम 'आरज़ू' आए बैठे हैं और वो शरमाए बैठे हैं
मुश्ताक़-नज़र गुस्ताख़ नहीं पर्दा सरकाना क्या जाने
आरज़ू लखनवी
शेर
हम 'आरज़ू' आए बैठे हैं और वो शरमाए बैठे हैं
मुश्ताक़-नज़र गुस्ताख़ नहीं पर्दा सरकाना क्या जाने
आरज़ू लखनवी
ग़ज़ल
हिम्मत किस की है जो पूछे ये 'आरज़ू'-ए-सौदाई से
क्यूँ साहब आख़िर अकेले में ये किस से बातें होती हैं
आरज़ू लखनवी
ग़ज़ल
आरज़ू लखनवी
ग़ज़ल
'आरज़ू' दिल के साथ साथ होश-ओ-ख़िरद भी फूँक दे
इश्क़ में आरज़ू-ए-इश्क़ शान-ए-क़लंदरी नहीं
