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ग़ज़ल
छेड़ मंज़ूर है क्या आशिक़-ए-दिल-गीर के साथ
ख़त भी आया कभी तो ग़ैर की तहरीर के साथ
निज़ाम रामपुरी
शेर
तिरछी नज़रों से न देखो आशिक़-ए-दिल-गीर को
कैसे तीर-अंदाज़ हो सीधा तो कर लो तीर को
वज़ीर अली सबा लखनवी
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ग़ज़ल
समझो दस्तावेज़ ज़ख़्म-ए-आशिक़-ए-दिल-गीर को
कब मिटा सकते हो अपने हाथ की तहरीर को
मुंशी बनवारी लाल शोला
ग़ज़ल
इस क़दर खिंचना नहीं अच्छा बुत-ए-बे-पीर देख
प्यार की नज़रों से सू-ए-आशिक़-ए-दिल-गीर देख
शेर सिंह नाज़ देहलवी
नज़्म
नूर-जहाँ का मज़ार
या हो गए वो दाग़ जहाँगीर के दिल के
क़ाबिल ही तो थे आशिक़-ए-दिल-गीर के दिल के!
तिलोकचंद महरूम
ग़ज़ल
खींच ले अव्वल ही से दिल की इनान-ए-इख़्तियार
तू ने गर ऐ आशिक़-ए-दिल-गीर फिर खींची तो क्या