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ग़ज़ल
मुमकिन है कि अब भी होंटों पर कोई भूला बिसरा शो'ला हो
मैं जलते जलते राख हुआ लहजा मद्धम करने के लिए
साक़ी फ़ारुक़ी
ग़ज़ल
ला-वारिस लाशों पर आख़िर कौन ही अश्क बहाता है
सब ने इक तस्वीर उतारी और बिसरा कर चले गए
मिताली राज तिवारी
ग़ज़ल
हिलाल फ़रीद
ग़ज़ल
मान लिया दिल बस में नहीं है फिर भी जीना तो होगा ही
या अब अपना तन बिसरा दूँ या फिर और कोई तन ढूँडूँ
बिमल कृष्ण अश्क
नज़्म
नाला सरमाया-ए-यक-आलम
कोई भूली हुई सूरत कोई बिसरा हुआ ख़्वाब
शब के सन्नाटे में खुलने लगे एहसास के बाब

