aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "chaah"
पंडित चाँद नरायण राज़दाँ मोनिस
लेखक
चाप ख़ाना-ए-मज्लिस
पर्काशक
चाप ख़ाना-ए-हैदरी
बदरूद्दीन चाच
चाव ली पो
मोहन लाल छा
चार यार पब्लिकेशन, इंदौर
मीनार बुक डिपो चार कमान, हैदराबाद
चस प्रेस, हैदराबाद
अहमद प्रेस चार मीनार, हैदराबाद
किताब महलचार कमान, हैदराबाद
चाप खाना, ईरान
चापख़ाना मशरिक़ी, जर्मनी
महमूद प्रेस, चार मीनार
चाप उफुक़, फ़रान्स
कभी हम में तुम में भी चाह थी कभी हम से तुम से भी राह थीकभी हम भी तुम भी थे आश्ना तुम्हें याद हो कि न याद हो
हम पर तुम्हारी चाह का इल्ज़ाम ही तो हैदुश्नाम तो नहीं है ये इकराम ही तो है
ऐ मिरी गुल-ज़मीं तुझे चाह थी इक किताब कीअहल-ए-किताब ने मगर क्या तिरा हाल कर दिया
जब तुझे मेरी चाह थी जानाँबस वही वक़्त था कड़ा मेरा
तुम उस के पास हो जिस को तुम्हारी चाह न थीकहाँ पे प्यास थी दरिया कहाँ बनाया गया
चाय महज़ एक ड्रिंक नहीं — एक एहसास है, एक लम्हा है, एक दोस्त है। इस सेक्शन में हमने कुछ ऐसे अशआर चुने हैं जो चाय के साथ जुड़ी गर्माहट, नॉस्टैल्जिया और ख़ामोश मसर्रत को बयान करते हैं। चाहे वह बारिश में तन्हाई हो, महफ़िल में हँसी हो, या ख़ामोशी में भीगी यादें — यह चुने हुए शेर चाय की हर घूँट पर एक ताज़ा एहसास का लुत्फ़ देते हैं।
चाक शायरी
चाहچَاہ
एक गहरा खोदा हुआ कुआँ जिसमें भूमिगत झरनों से पानी बहता है, कुआँ, कूप
चाहीچاہی
वह ज़मीन जो कुएँ के पानी से सींची जाती हो
चाहाچاہا
चाहा2 (सं.)
चाहेچاہے
' यदि जी चाहे ' का संक्षिप्त रूप। यदि जी चाहे। यदि मन में आवे। जैसे-(क) चाहे यहाँ रहो, चाहे वहाँ। (ख) जो चाहे सो करो।
Sweta Chah
शौकत थानवी
हास्य-व्यंग
Saveeta Chaah
सामाजिक
Ramz-e-Sheerin Chah-e-Shor
मौलवी मोहम्मद सलामतुल्लाह
Chah Darpesh
वक़ार इब्ने इलाही
प्रतीकात्मक / कलात्मक कहानियाँ
Masnavi Pas Chah Bayad Kardai Aqwam-e-Sharq
अल्लामा इक़बाल
Chah-e-Yusuf
रहबर मिर्ज़ा
Chah Redio Lecturon Ka Majmua
सय्यद मोहम्मद अली
व्याख्यान
Pas Chah Bayad Kard Ma Musafir
अननोन ऑथर
शायरी
Sautiya Chah
अफ़साना
Chah Nama Masail
फरीदुद्दीन
शाइरी
Arabi Bol Chal
मोहम्मद अमीन
भाषा विज्ञान
Apna Gareban Chaak
जावेद इक़बाल
आत्मकथा
Qissa Char Darvesh
मीर अम्मन
नॉवेल / उपन्यास
Aadab-e-Zindagi
मौलाना अशरफ़ अली थानवी
इस्लामियात
Char Deewari
शौकत सिद्दीक़ी
आरज़ू है वफ़ा करे कोईजी न चाहे तो क्या करे कोई
है नाज़-ए-हुस्न से जो फ़रोज़ाँ जबीन-ए-यारलबरेज़ आब-ए-नूर है चाह-ए-ज़क़न तमाम
बारिश हुई तो फूलों के तन चाक हो गएमौसम के हाथ भीग के सफ़्फ़ाक हो गए
चाह तो निकल सकी, न पर उमर निकल गईगीत अश्क बन गए
लेकिन उस को चाह थी मेरीवो ये भेद छुपा न सकी थी
एक हम हैं कि हुए ऐसे पशेमान कि बसएक वो हैं कि जिन्हें चाह के अरमाँ होंगे
मिरी धड़कनों के क़रीब थे मिरी चाह थे मिरा ख़्वाब थेवो जो रोज़-ओ-शब मिरे पास थे वही लोग मुझ से बिछड़ गए
तुझ को देखा तो सेर-चश्म हुएतुझ को चाहा तो और चाह न की
भर भर नज़रें देखें तुझ को आते-जाते लोगदेख तुझे बदनाम न कर दे ये हिरनी सी चाल
ये दिलबरी ये नाज़ ये अंदाज़ ये जमालइंसाँ करे अगर न तिरी चाह क्या करे
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