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नज़्म
घर की रौनक़
वो पहला शख़्स जौ खा कर छुरे का ज़ख़्म गिरा
मज़े की बात तो ये है, ग़रीब गूँगा था
रज़ा नक़वी वाही
नज़्म
मेरी बे-लिबासी तुम्हारा पहनावा नहीं
मैं जितना टूट सकता था, टूट चुका
क्या तुम मेरे चूरे से
अंजुम सलीमी
ग़ज़ल
गला काटा छुरे से अपना मिज़्गाँ के तसव्वुर में
बहाया शब लहू का हम ने बाला-पोश में दरिया
मिर्ज़ा रहीमुद्दीन हया
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नज़्म
मैं पल दो पल का शा'इर हूँ
कल और आएँगे नग़्मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले
मुझ से बेहतर कहने वाले तुम से बेहतर सुनने वाले
साहिर लुधियानवी
शेर
बच्चों के छोटे हाथों को चाँद सितारे छूने दो
चार किताबें पढ़ कर ये भी हम जैसे हो जाएँगे
निदा फ़ाज़ली
नज़्म
निसार मैं तेरी गलियों के
जो कोई चाहने वाला तवाफ़ को निकले
नज़र चुरा के चले जिस्म ओ जाँ बचा के चले
