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ग़ज़ल
मोहब्बत में नहीं दिखती इबादत वो पुरानी सी
ज़माने में कहीं अब कोई पागल क्यों नहीं होता
राघवेंद्र द्विवेदी
ग़ज़ल
ऐसे मुझ पर भी तिरे ग़म के निशाँ दिखते हैं
जैसे मौसम का 'इमारत पे असर पड़ता है
मोहसिन आफ़ताब केलापुरी
हास्य
रो रो के याद करती हूँ फ़ादर पिदर को मैं
दिखती है सास ही मुझे देखूँ जिधर को मैं




