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ग़ज़ल
दिल-ओ-दीं खो के कोई यास की दुनिया न बने
न बने बुत ये ख़ुदा भी हों तो बंदा न बने
अब्दुल करीम शाइक़
ग़ज़ल
रुस्वाइयों के ख़ौफ़ से उठता नहीं मैं 'दिल'
ऐ काश दिल को रखता किसी बंदिशों में दोस्त
दिल सिकन्दरपुरी
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