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ग़ज़ल
न गुल से है ग़रज़ तेरे न है गुलज़ार से मतलब
रखा चश्म-ए-नज़र शबनम में अपने यार से मतलब
मह लक़ा चंदा
ग़ज़ल
रहे नौ-रोज़ इशरत-आफ़रीं जोश-ए-बहार-अफ़्ज़ा
गुल-अफ़शाँ है करम तेरा चमन में दहर के हर जा
मह लक़ा चंदा
शेर
बसंत आई है मौज-ए-रंग-ए-गुल है जोश-ए-सहबा है
ख़ुदा के फ़ज़्ल से ऐश-ओ-तरब की अब कमी क्या है
मह लक़ा चंदा
ग़ज़ल
बसंत आई है मौज-ए-रंग-ए-गुल है जोश-ए-सहबा है
ख़ुदा के फ़ज़्ल से ऐश-ओ-तरब की अब कमी क्या है
मह लक़ा चंदा
ग़ज़ल
ज़माने में हमेशा हर महीने चाँद होता है
तिरा जल्वा नज़र आता नहीं ऐ मह-लक़ा बरसों
लाला माधव राम जौहर
ग़ज़ल
गुल की बहार गुलसिताँ में चंद रोज़ है
अच्छा नहीं है इस क़दर ऐ मह-लक़ा दिमाग़