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ग़ज़ल
परस्तिश कर रहा है हर जवान-ओ-पीर पत्थर की
सनम-ख़ाने में आ कर जाग उठी तक़दीर पत्थर की
जौहर बदायूनी
ग़ज़ल
बना है शीशा-ए-मय सर-ब-सर आईना-ए-महशर
बरी ज़ोहद-ओ-रिया से है जवान-ए-पीर-ए-मय-ख़ाना
दत्तात्रिया कैफ़ी
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ग़ज़ल
बाज़ मक़्तूल हुए बाज़ों ने फाँसी पाई
नाम को भी न रहे पीर-ओ-जवान-ए-देहली
सय्यद मेहदी हुसैन मेहदी
नज़्म
रोज़ा-ख़ोर से इंटरव्यू
पंद्रह घंटे का रोज़ा हर जवान ओ पीर का
शाम करना सुब्ह का लाना है जू-ए-शीर का
खालिद इरफ़ान
नज़्म
इंक़लाब-ए-हिन्द
कर रहा है क़स्र-आज़ादी की बुनियाद उस्तुवार
फ़ितरत-ए-तिफ़्ल-ओ-ज़न-ओ-पीर-ओ-जवाँ का इंक़लाब
ज़फ़र अली ख़ाँ
ग़ज़ल
ख़ुश्क ओ तर फूँकती फिरती है सदा आतिश-ए-इश्क़
बचियो इस आँच से ऐ पीर ओ जवाँ सुनते हो
क़ाएम चाँदपुरी
ग़ज़ल
सब एक रंग में हैं मय-कदे के ख़ुर्द ओ कलाँ
यहाँ तफ़ावुत-ए-पीर-ओ-जवाँ नहीं होता