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नज़्म
रक़ीब से!
हम ने इस इश्क़ में क्या खोया है क्या सीखा है
जुज़ तिरे और को समझाऊँ तो समझा न सकूँ
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
फ़ितरत-ए-हुस्न तो मा'लूम है तुझ को हमदम
चारा ही क्या है ब-जुज़ सब्र सो होता भी नहीं
फ़िराक़ गोरखपुरी
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aaj
आज آج
वर्तमान दिन, आज का बीतता हुआ दिन, आज, आज का दिन, उपस्थित, वर्तमान समय, मौजूदा लम्हा, मौजूदा दिन, मौजूदा ज़माना, रोज़ जो गुज़र रहा है
aaj ko
आज को آج کو
आज, ऐसे अवसर पर, ऐसे दिनों में (अक्सर पछतावा एवं इच्छा के अवसर पर प्रयुक्त)
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नज़्म
दो इश्क़
इस इश्क़ न उस इश्क़ पे नादिम है मगर दिल
हर दाग़ है इस दिल में ब-जुज़-दाग़-ए-नदामत
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
क़लंदर जुज़ दो हर्फ़-ए-ला-इलाह कुछ भी नहीं रखता
फ़क़ीह-ए-शहर क़ारूँ है लुग़त-हा-ए-हिजाज़ी का
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
एक लड़का
मईशत दूसरों के हाथ में है मेरे क़ब्ज़े में
जुज़ इक ज़ेहन-ए-रसा कुछ भी नहीं फिर भी मगर मुझ को
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
वालिदा मरहूमा की याद में
ख़ूगर-ए-परवाज़ को परवाज़ में डर कुछ नहीं
मौत इस गुलशन में जुज़ संजीदन-ए-पर कुछ नहीं
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
मिरे अशआ'र पर ख़ामोश है जिज़-बिज़ नहीं होता
ये वाइज़ वाइ'ज़ों में कुछ हक़ीक़त-आश्ना होगा
हरी चंद अख़्तर
ग़ज़ल
हाज़िर हैं कलीसा में कबाब ओ मय-ए-गुलगूँ
मस्जिद में धरा क्या है ब-जुज़ मौइज़ा ओ पंद
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
ब-जुज़ दीवानगी वाँ और चारा ही कहो क्या है
जहाँ अक़्ल ओ ख़िरद की एक भी मानी नहीं जाती
