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ग़ज़ल
अक़्ल-ओ-शुऊर भी हैं क्या उक़्दा-ए-राज़-ए-दहर हैं
रह गए और उलझ के हम सई-ए-कशूद-ए-राज़ में
जिगर बरेलवी
ग़ज़ल
कशूद-ए-मतलब-ए-आशिक़ के हैं लब पर गुमाँ क्या क्या
अदा-ए-ख़ामुशी में भर दिया रंग-ए-बयाँ क्या क्या
ज़हीर देहलवी
ग़ज़ल
जहाँ कशूद-ए-नवा पर ख़िज़ाँ के पहरे हैं
वहीं बहार-ए-ग़ज़ल-ख़्वाँ है देखिए क्या हो
सय्यद आबिद अली आबिद
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नज़्म
भली सी एक शक्ल थी
मैं इश्क़ का असीर था
वो इश्क़ को क़फ़स कहे
कि उम्र भर के साथ को
वो बद-तर-अज़-हवस कहे
अहमद फ़राज़
ग़ज़ल
कहूँ किस से मैं कि क्या है शब-ए-ग़म बुरी बला है
मुझे क्या बुरा था मरना अगर एक बार होता



