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नज़्म
फ़रार
वो कँवल जिन को कभी उन के लिए खिलना था
उन की नज़रों से बहुत दूर भी खिल सकते हैं
साहिर लुधियानवी
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ग़ज़ल
गुल-ए-रंगीं ये कहता है कि खिलना हुस्न खोना है
मगर ग़ुंचा समझता है निखरता जा रहा हूँ मैं
नुशूर वाहिदी
ग़ज़ल
जो गुलशन में किसी ने देख खिलना ग़ुंचा-ए-गुल का
कहा बस आ के याँ लज़्ज़त उठाना इस को कहते हैं






