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ग़ज़ल
दिल-ए-मर्द-ए-मुसलमाँ में किसी बुत का क़दम आया
मिरी दुनिया में तुम आए कि पत्थर का सनम आया
रियाज़त अली शाइक
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नज़्म
कराची का ट्रैफ़िक
न पुलिस का है इसे ख़ौफ़ न चालान का डर
है अगर डर तो उसी मर्द-ए-मुसलमान का डर
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
ग़ज़ल
बे-बस इतने हुए क्यूँ इश्क़-ए-बुताँ में 'ज़ाकिर'
कुफ़्र बकने लगे इक मर्द-ए-मुसलमाँ हो कर
अब्दुल हकीम ज़ाकिर
शेर
इन बुतों ने मुझ को बे-ख़ुद किस क़दर धोके दिए
सीधा-सादा जान कर मर्द-ए-मुसलमाँ देख कर
अब्बास अली ख़ान बेखुद
क़ितआ
वो बोला मैं क्रिकेटर भी हूँ और मर्द-ए-मुसलमाँ भी
मुसलमाँ मर्द को बस चार ही रन की इजाज़त है
सरफ़राज़ शाहिद
नज़्म
देहली की सड़कें
पी के इस सहबा को होतीं मोटरें मस्त-ए-ख़िराम
मैं तो हूँ मर्द-ए-मुसलमाँ मुझ पे पीना है हराम
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
नज़्म
इबलीस की मजलिस-ए-शूरा
किस की नौ-मीदी पे हुज्जत है ये फ़रमान-ए-जदीद
है जिहाद इस दौर में मर्द-ए-मुसलमाँ पर हराम
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
दिन को रोज़ा 'ईद शब को है 'अजब शग़्ल-ए-'रियाज़'
रात-भर पीता है ये मर्द-ए-मुसलमाँ आज-कल
रियाज़ ख़ैराबादी
ग़ज़ल
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
नज़्म
सुब्ह-ए-शब-ए-इंतिज़ार
निगाह को थी मगर मीर-ए-कारवाँ की तलाश
नज़र जो उट्ठी तो देखा कि एक मर्द-ए-फ़क़ीर