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शेर
पैग़ाम-ए-लुत्फ़-ए-ख़ास सुनाना बसंत का
दरिया-ए-फ़ैज़-ए-आम बहाना बसंत का
जितेन्द्र मोहन सिन्हा रहबर
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ग़ज़ल
अभी ये ज़ख़्म-ए-मसर्रत है ना-शगुफ़्ता सा
छिड़क दो मेरे कुछ आँसू हँसी के चेहरे पर
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
है ज़िक्र-ए-यार क्यूँ शब-ए-ज़िंदाँ से दूर दूर
ऐ हम-नशीं ये तर्ज़ ग़ज़ल का कभी न था
बद्र-ए-आलम ख़लिश
ग़ज़ल
पत्थरों के रास्ते से अपने शीशे के क़दम
सई-ए-ला-हासिल का इक पैग़ाम ले कर आए हैं
