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ग़ज़ल
ज़मीं को मिल के सँवारें मिसाल-ए-रू-ए-निगार
रुख़-ए-निगार से रौशन चराग़-ए-बाम करें
मजरूह सुल्तानपुरी
ग़ज़ल
ज़मीं को मिल के सँवारें मिसाल-ए-रू-ए-निगार
रुख़-ए-निगार से रौशन चराग़-ए-बाम करें
मजरूह सुल्तानपुरी
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ग़ज़ल
तू उरूस-ए-शाम-ए-ख़याल भी तो जमाल-ए-रू-ए-सहर भी है
ये ज़रूर है कि ब-ईं हमा मिरा एहतिमाम-ए-नज़र भी है
सुरूर बाराबंकवी
ग़ज़ल
तू उरूस-ए-शाम-ए-ख़याल भी तू जमाल-ए-रू-ए-सहर भी है
ये ज़रूर है कि ब-ईं-हमा मिरा एहतिमाम-ए-नज़र भी है
सुरूर बाराबंकवी
ग़ज़ल
छुपा कर मेरी नज़रों से जमाल-ए-रू-ए-ताबाँ को
सहारा दे रहा है कोई मेरे ज़ौक़-ए-इरफ़ाँ को
मुस्लिम अंसारी
ग़ज़ल
ज़ौक़-ए-सरमस्ती को महव-ए-रू-ए-जानाँ कर दिया
कुफ़्र को इस तरह चमकाया कि ईमाँ कर दिया
असग़र गोंडवी
ग़ज़ल
फिर मुझे लिखना जो वस्फ़-ए-रू-ए-जानाँ हो गया
वाजिब इस जा पर क़लम को सर झुकाना हो गया


