aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "mo.ajaze"
असरार-उल-हक़ मजाज़
1911 - 1955
शायर
मुज़्तर मजाज़
1935 - 2018
लेखक
मजाज़ जयपुरी
born.1937
मजाज़ अमरोहवी
सरवर मजाज़
अल्लाह बख़्श मजाज़ हनफ़ी
हामिद मजाज़
मुअज़्ज़ज़ क़ैसर
मजाज़ नूरी
एजाज़ अहमद मोजिज़
मुस्तफ़ा मजाज़
नियाज़ अहमद मजाज़ अंसारी
मजाज़ देहलवी
संपादक
मोअस्सा-ए-तहक़ीक़ात-ए असाई मयाना-ओ-ग़रबी ,कराची
पर्काशक
न्यू मजाज़ प्रेस, कराची
याद आते हैं मोजज़े अपनेऔर उस के बदन का जादू भी
मोजज़े इश्क़ दिखाता है 'सिकंदर'-साहिबचोट तो उस को लगी देखिए चोटिल हुआ मैं
मोजज़े का दर खुला और इक असा रौशन हुआदूर गहरे पानियों में रास्ता रौशन हुआ
सुना है हम ने दिखाते हो मोजज़े अक्सरमैं गिर गया हूँ उठाओ तो कोई बात बने
मंज़र से हैं न दीदा-ए-बीना के दम से हैंसब मोजज़े तिलिस्म-ए-तमाशा के दम से हैं
अग्रणी एवं प्रख्यात प्रगतिशील शायर, रोमांटिक और क्रांतिकारी नज़्मों के लिए प्रसिद्ध, ऑल इंडिया रेडियो की पत्रिका “आवाज” के पहले संपादक, मशहूर शायर और गीतकार जावेद अख़्तर के मामा
कुल्लियात-ए-मजाज़
कुल्लियात
Majaz Se Faraz Tak
संकलन
मजाज़ के लतीफे
अहमद जमाल पाशा
लतीफ़े
मजाज़ की शाइरी
Insani Jism
शमसुल इस्लाम फ़ारूक़ी
विज्ञान
Dastan-e-Ajeeb
जमील अहमद
Naqsh Haye Rang Rang
शायरी
मजाज़ और उसकी शायरी
मजाज़ हयात और शायरी
मंज़र सलीम
Aahang
Majaz Ki Batein
सहबा (फ़रीद) लियाक़त अली
जीवनी
Khushbu Ka Lahu
मजाज़ आशना
कलाम-ए-मजाज़
Hidayat Nama
मौलाना मजाज़ आज़मी
इस्लामियात
क़ौमी महाज़-ए-आज़ादी और मुस्लिम शोअरा-ए-उत्तर प्रदेश
आबिदा समीउद्दीन
दश्त-ए-वीराँ का सफ़र है और नज़र के सामनेमो'जज़े दर मो'जज़े दर मो'जज़े होते हुए
इन्किशाफ़ात हो चुके सारेमोजज़े को अना में रक्खा गया
धुआँ धनक हुआ अँगार फूल बनते गएतुम्हारे हाथ भी क्या मोजज़े दिखाने लगे
मोजज़े लफ़्ज़ मिरे ख़ल्क़ करेंगे ऐसेचुप रही फिर भी ज़माने को सुनाई दूँगी
मेरे दोस्तताकि हम हमेशा मोहब्बत और शिफ़ा-याबी के मोजज़े में
तमाम मोजज़े सारी शहादतें ले करमैं आब ओ ख़ाक से गुज़रा अदावतें ले कर
किसे गुमाँ था कि बादशाहों के तख़्त क़दमों में आ गिरेंगेकिसे गुमाँ था कि मोजज़े सब हक़ीक़तों से दिखाई देंगे
दिखाए मोजज़े गर वो बुत-ए-अय्यार चुटकी मेंतो बोले ताइर-ए-रंग-ए-हिना हर बार चुटकी में
सुना है उस को भी है शेर ओ शाइरी से शग़फ़सो हम भी मो'जिज़े अपने हुनर के देखते हैं
कभी ऐ हक़ीक़त-ए-मुंतज़र नज़र आ लिबास-ए-मजाज़ मेंकि हज़ारों सज्दे तड़प रहे हैं मिरी जबीन-ए-नियाज़ में
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