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नज़्म
इजाज़त हो तो तुम को प्यार कर लूँ
दिल-ए-पज़-मुर्दा को गुलज़ार कर लूँ
मोहब्बत को गले का हार कर लूँ
अफ़ज़ल पेशावरी
ग़ज़ल
दिल-ए-मुर्दा दिल नहीं है इसे ज़िंदा कर दुबारा
कि यही है उम्मतों के मर्ज़-ए-कुहन का चारा
अल्लामा इक़बाल
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murda-dil
मुर्दा-दिल مُرْدَہ دِل
जिसका मन बहुत ही उचाट और नीरस हो, मृतहृदय, हतमानस, हतचित्र
dil-e-murda
दिल-ए-मुर्दा دِلِ مُرْدَہ
मृत ह्रदय, प्रेमी का हृदय, मुरझाया हुआ दिल, मुरझाया हुआ स्वभाव
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नज़्म
मैं जिंसी खेल को सिर्फ़ इक तन-आसानी समझता हूँ
लुभाते नाच नाचें और रसीले राग भी गाएँ
मगर ये मुर्दा-दिल आदी है बस ग़मगीं ख़यालों का
मीराजी
ग़ज़ल
ज़िंदा हो जाता हूँ मैं जब यार का आता है ख़त
रूह-ए-ताज़ा मुर्दा-दिल के वास्ते लाता है ख़त
श्याम सुंदर लाल बर्क़
ग़ज़ल
अफ़्सुर्दा दिल था अब तो हुआ ग़म से मुर्दा-दिल
जीता हूँ देखने में वले मुझ में जाँ नहीं
शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम
नज़्म
जज़्बा-ए-ईसार
नज़र आएँगे हर सू शम-ए-आज़ादी के परवाने
हज़ारों मुर्दा दिल हो जाएँगे बेदार फाँसी से
सरदार नौबहार सिंह साबिर टोहानी
ग़ज़ल
किया करते हैं मुर्दा-दिल हमेशा मौत की बातें
जो ज़िंदा-दिल हैं वो तो ज़िंदगी की बात करते हैं
मक़बूल अहमद मक़बूल
ग़ज़ल
किया करते हैं मुर्दा-दिल हमेशा मौत की बातें
जो ज़िंदा-दिल हैं वो तो ज़िंदगी की बात करते हैं
मक़बूल अहमद मक़बूल
ग़ज़ल
इतना ख़ुश-फ़हम न हो ऐ दिल-ए-पज़-मुर्दा कि अब
वो शगूफ़े जो न खिल पाएँ कुचल जाते हैं