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नज़्म
सरहदें
रोम के बुत हों कि पैरिस की हो मोनालीज़ा
कीट्स की क़ब्र हो या तुर्बत-ए-फ़िरदौसी हो
अहमद फ़राज़
ग़ज़ल
तू ख़ुसरव-ए-ख़ूबाँ है कि ले हिन्द सीं ता रोम
पहुँची है तिरे हुस्न-ए-जहाँगीर की आवाज़
सिराज औरंगाबादी
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नज़्म
सय्यारों की महफ़िल
तबाही का दिया इल्ज़ाम तुझ को रोम वालों ने
तुझे भारत के दानिश-वर सदा मनहूस कहते हैं
अब्दुल क़ादिर
नज़्म
अपने जैसे आशिक़ों के नाम
ज़मीन भर की धूप में से मेरे हिस्से की धूप
मेरे रोम रोम को सेंकती थी


