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ग़ज़ल
पड़ा हूँ ज़ेर-ए-क़दम ख़ाक-ए-रहगुज़र बन कर
झुका हूँ मैं हमा-तन उस गली में सर बन कर
मज़ाक़ बदायूनी
ग़ज़ल
ज़ुल्फ़-ए-कज-रफ़्तार की कब चाल चल सकता है वो
ऐसी ठोकर खाए सर बन जाए रोड़ा साँप का
इमदाद अली बहर
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