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ग़ज़ल
मगर उस को फ़रेब-ए-नर्गिस-ए-मस्ताना आता है
उलटती हैं सफ़ें गर्दिश में जब पैमाना आता है
हैदर अली आतिश
ग़ज़ल
खड़े हों दोस्त कि दुश्मन सफ़ें सब एक सी हैं
वो जानता है इधर से नहीं गुज़रने का
राजेन्द्र मनचंदा बानी
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शेर
निज़ाम-ए-मय-कदा साक़ी बदलने की ज़रूरत है
हज़ारों हैं सफ़ें जिन में न मय आई न जाम आया
आनंद नारायण मुल्ला
ग़ज़ल
सफ़ें यूँ तो मुक़ाबिल दुश्मनों की हैं मगर उन में
अजब इक मेहरबाँ चेहरा दिखाई साफ़ देता है










