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नज़्म
रक़ीब से!
हम ने इस इश्क़ में क्या खोया है क्या सीखा है
जुज़ तिरे और को समझाऊँ तो समझा न सकूँ
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
शेर
मोहब्बत को समझना है तो नासेह ख़ुद मोहब्बत कर
किनारे से कभी अंदाज़ा-ए-तूफ़ाँ नहीं होता
ख़ुमार बाराबंकवी
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me.n samajhnaa
में समझनाمیں سَمَجھنا
ध्यान करना, दिल में कुछ और सोचना
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ग़ज़ल
मजरूह सुल्तानपुरी
ग़ज़ल
गुमाँ तो क्या यक़ीं भी वसवसों की ज़द में होता है
समझना संग-ए-दर को संग-ए-दर आसाँ नहीं होता
अदा जाफ़री
नज़्म
हिण्डोला
नए सिरे से समझना पड़ा है दुनिया को
बड़े जतन से सँभाला है ख़ुद को मैं ने नदीम