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नज़्म
किसान
पारा पारा अब्र सुर्ख़ी सुर्ख़ियों में कुछ धुआँ
भूली-भटकी सी ज़मीं खोया हुआ सा आसमाँ
जोश मलीहाबादी
नज़्म
एक तस्वीर-ए-रंग
तेरे नाज़ुक से परों पर ये ज़र-ओ-सीम का बोझ
तेरी परवाज़ को आज़ाद न होने देगा
साहिर लुधियानवी
ग़ज़ल
धोता हूँ जब मैं पीने को उस सीम-तन के पाँव
रखता है ज़िद से खींच के बाहर लगन के पाँव
मिर्ज़ा ग़ालिब
नज़्म
बरसात की बहारें
ज़रदार की तो उन में है बिछ रही पलंगड़ी
दिलबर परी सी बैठी झमकाए चूड़ी निबगड़ी
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
आज की बातें कल के सपने
जब भी तन्हा मुझे पाते हैं गुज़रते लम्हे
तेरी तस्वीर सी राहों में बिछा जाते हैं
क़तील शिफ़ाई
ग़ज़ल
मर्द-ए-दरवेश का सरमाया है आज़ादी ओ मर्ग
है किसी और की ख़ातिर ये निसाब-ए-ज़र-ओ-सीम
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
मयूरका
तुनुक-लिबासियाँ शनावरों की थीं क़यामतें
तमाम सीम-तन शरीक-ए-जश्न-ए-शहर-ए-आब थे
अहमद फ़राज़
ग़ज़ल
तवंगर था बनी थी जब तक उस महबूब-ए-आलम से
मैं मुफ़्लिस हो गया जिस रोज़ से वो सीम-तन बिगड़ा
हैदर अली आतिश
ग़ज़ल
ये कब तक सीम-ओ-ज़र के जंगलों में मश्क़-ए-ख़ूँ-ख़्वारी
ये इंसानों की बस्ती है अब इंसानों में आ जाओ
अली सरदार जाफ़री
नज़्म
इंक़लाब
अभी दिमाग़ पे क़हबा-ए-सीम-ओ-ज़र है सवार
अभी रुकी ही नहीं तेशा-ज़न के ख़ून की धार














