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नज़्म
लखनऊ
तोले हुए है तेग़-ओ-सिनाँ हुस्न-ए-बे-नक़ाब
नावक-फ़गन है जल्वा-ए-पिन्हान-ए-लखनऊ
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
जौन-एलिया से आख़री मुलाक़ात
कभी ये गुलनार हो गया है सिनाँ पे गुफ़्तार हो गया है
कभी हुआ है ये ग़र्क़-ए-दरिया
तारिक़ क़मर
ग़ज़ल
फ़ज़ा में वहशत-ए-संग-ओ-सिनाँ के होते हुए
क़लम है रक़्स में आशोब-ए-जाँ के होते हुए
इफ़्तिख़ार आरिफ़
नज़्म
लहू का सुराग़
न सुर्ख़ी-ए-लब-ए-खंजर न रंग-ए-नोक-ए-सिनाँ
न ख़ाक पर कोई धब्बा न बाम पर कोई दाग़
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
मिस्ल-ए-गुल ज़ख़्म है मेरा भी सिनाँ से तव्वाम
तेरा तरकश ही कुछ आबिस्तनी-ए-तीर नहीं
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
यूँ दाद-ए-सुख़न मुझ को देते हैं इराक़ ओ पारस
ये काफ़िर-ए-हिन्दी है बे-तेग़-ओ-सिनाँ ख़ूँ-रेज़
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
जिस रोज़ क़ज़ा आएगी
और कहीं दूर से अंजान गुलाबों की बहार
यक-ब-यक सीना-ए-महताब को तड़पाने लगे


