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नज़्म
क़ैद-ए-तन्हाई
कासा-ए-दिल में भरी अपनी सुबूही मैं ने
घोल कर तलख़ी-ए-दीरोज़ में इमरोज़ का ज़हर
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
यक़ीं है सुब्ह-ए-क़यामत को भी सुबूही-कश
उठेंगे ख़्वाब से साक़ी सुबू सुबू करते
शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
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ई-पुस्तक
सूफ़ी काव्य
सूफ़ी काव्य
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ग़ज़ल
'शाइर' ख़ुदा के वास्ते तौबा का क्या क़ुसूर
है किस के मुँह से फिर ये सुबूही लगी हुई
आग़ा शाइर क़ज़लबाश
नज़्म
इलाज बिल-मिस्ल
जब शब-ए-ज़िंदा-दारी में मय चढ़ती है
तो सुब्ह सुबूही की सीढ़ी लगवाता हूँ
वहीद अहमद
शेर
रोज़ा रखता हूँ सुबूही पी के हंगाम-ए-सहर
शाम को मस्जिद में होता हूँ जमाअत का शरीक










