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नज़्म
क़ैद-ए-तन्हाई
कासा-ए-दिल में भरी अपनी सुबूही मैं ने
घोल कर तलख़ी-ए-दीरोज़ में इमरोज़ का ज़हर
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
यक़ीं है सुब्ह-ए-क़यामत को भी सुबूही-कश
उठेंगे ख़्वाब से साक़ी सुबू सुबू करते
शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
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ग़ज़ल
'शाइर' ख़ुदा के वास्ते तौबा का क्या क़ुसूर
है किस के मुँह से फिर ये सुबूही लगी हुई
आग़ा शाइर क़ज़लबाश
नज़्म
इलाज बिल-मिस्ल
जब शब-ए-ज़िंदा-दारी में मय चढ़ती है
तो सुब्ह सुबूही की सीढ़ी लगवाता हूँ
वहीद अहमद
शेर
रोज़ा रखता हूँ सुबूही पी के हंगाम-ए-सहर
शाम को मस्जिद में होता हूँ जमाअत का शरीक
सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम
ग़ज़ल
कहाँ हम ढूँडते तुझ को फिरेंगे उस घड़ी साक़ी
सुबूही के लिए थोड़ी सी पैमाने में रख देना
नूह नारवी
ग़ज़ल
उन की रुख़्सत इक क़यामत थी दम-ए-इज़हार-ए-सुब्ह
शाम तक बचता नज़र आता नहीं बीमार-ए-सुब्ह
मुंशी नौबत राय नज़र लखनवी
नज़्म
तिश्नगी
रातें जो पिछले पहर अश्कों से मुँह धोती हैं
सुब्ह होती है तो पी जाता है सूरज उन को





