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नज़्म
क्लर्क का नग़्मा-ए-मोहब्बत
रस्ते में शहर की रौनक़ है इक ताँगा है दो कारें हैं
बच्चे मकतब को जाते हैं और तांगों की क्या बात कहूँ
मीराजी
हास्य
मैं टंगा रहा था मुंडेर पर कि कभी तो आएगा सेहन में
मैं था मुंतज़िर किसी और का मुझे घूरता कोई और है
ज़ियाउल हक़ क़ासमी
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ग़ज़ल
क्या मकाँ-ख़ुर्दा ख़लाइक़ में चले उस का ख़याल
तंग-हा-ए-शहर कुछ रस्ता निकाल उस के लिए
अख़्तर हुसैन जाफ़री
नज़्म
ईद की अचकन
अचकन नहीं इस वक़्त अबा और क़बा है
या कोई दो-शाला है जो खूँटी पे टंगा है
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
ग़ज़ल
नासिर अमरोहवी
नज़्म
क़तरा क़तरा एहसास
फैल कर फिर शब-ए-तारीक हुई बहर-ए-सियाह
क़तरा क़तरा लब-ए-तन्हाई से टपके एहसास








