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नज़्म
आधी रात
ख़ुद अपने आप में ये काएनात डूब गई
ख़ुद अपनी कोख से फिर जगमगा के उभरेगी
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़ज़ल
हमारे डूबने के बाद उभरेंगे नए तारे
जबीन-ए-दहर पर छटकेगी अफ़्शाँ हम नहीं होंगे